Guru Brihaspati : एक ऋषि पुत्र कैसे बना स्वर्ग का सबसे बड़ा सलाहकार? हैरान कर देगी यह पौराणिक गाथा
News India Live, Digital Desk: अक्सर जब भी हमारे जीवन में बुद्धि, ज्ञान या सौभाग्य की कमी होती है, तो ज्योतिषी हमें 'गुरु' को मजबूत करने की सलाह देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि खुद 'गुरु' यानी बृहस्पति देव ने यह स्थान कैसे हासिल किया? यह कहानी किसी को भी प्रेरित कर सकती है क्योंकि यह बताती है कि पद और सम्मान विरासत में नहीं, बल्कि तपस्या से मिलते हैं।
कौन थे बृहस्पति देव?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, बृहस्पति देव महान महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं। बचपन से ही वे बहुत मेधावी और शांत स्वभाव के थे। उनके पास ज्ञान का भंडार था, लेकिन वे कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे वे समाज और धर्म की सही मायनों में सेवा कर सकें।
जब 'प्रभास क्षेत्र' में शुरू हुई कठोर तपस्या
कहा जाता है कि देवगुरु का पद प्राप्त करने के लिए बृहस्पति ने भगवान शिव की शरण ली। वे समुद्र के किनारे 'प्रभास क्षेत्र' (जो वर्तमान में गुजरात के पास है) में चले गए और वहां भगवान शिव का पार्थिव लिंग बनाकर वर्षों तक घोर तपस्या की। उनकी भक्ति इतनी निस्वार्थ और कठोर थी कि देवराज इंद्र सहित सभी देवता भी उनके तेज से अचंभित रह गए।
भगवान शिव ने दी 'देवगुरु' की उपाधि
बृहस्पति की अटूट श्रद्धा देखकर भगवान शिव प्रसन्न हुए और उनके सामने प्रकट हुए। शिव जी ने उनकी विद्वता और तपस्या को देखते हुए उन्हें न केवल 'देवताओं का गुरु' (Devguru) बनाया, बल्कि उन्हें नवग्रहों में 'गुरु' के रूप में सबसे महत्वपूर्ण स्थान भी दिया। भगवान शिव ने ही उन्हें यह वरदान दिया था कि उनके परामर्श के बिना देवताओं का कोई भी काम सफल नहीं होगा।
क्यों जरूरी है बृहस्पति का मार्गदर्शन?
तब से लेकर आज तक, बृहस्पति देव को देवताओं का पुरोहित और प्रधान सलाहकार माना जाता है। उनके पास न्याय, व्याकरण और राजनीति की वह समझ है जो किसी अन्य के पास नहीं। जब भी देवता किसी संकट में फँसते हैं (चाहे वो असुरों का हमला हो या कोई आंतरिक मतभेद), वे हमेशा बृहस्पति देव के पास ही जाते हैं।
आज के युवाओं के लिए इस कथा का सबसे बड़ा सबक यही है कि ज्ञान कभी व्यर्थ नहीं जाता। यदि आप भी अपने काम में निरंतर लगे रहें और सही मार्ग का चयन करें, तो बड़ी से बड़ी उपलब्धि आपके कदम चूमती है। तो अगली बार जब आप गुरुवार के दिन पीला तिलक लगाएँ, तो याद कीजिएगा उस मेहनत और तपस्या को जिसने एक इंसान (ऋषि पुत्र) को 'देवताओं का शिक्षक' बना दिया।