ईरान के हमलों से दहला खाड़ी क्षेत्र, अब सैन्य विकल्प पर विचार कर रहे अरब देश क्या छिड़ेगी महाजंग?
News India Live, Digital Desk: मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) में हालात अब बेकाबू होते नजर आ रहे हैं। ईरान की ओर से बढ़ते हमलों और आक्रामक रुख ने खाड़ी देशों (Gulf Nations) की नींद उड़ा दी है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और अन्य खाड़ी देश अब ईरान के खिलाफ 'सैन्य विकल्पों' (Military Options) पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीति विफल रही, तो खाड़ी क्षेत्र में एक भीषण युद्ध छिड़ सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और तेल आपूर्ति पर पड़ेगा।
ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों ने बढ़ाई बेचैनी
पिछले कुछ दिनों में खाड़ी क्षेत्र के महत्वपूर्ण तेल प्रतिष्ठानों और व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाकर किए गए संदिग्ध ड्रोन हमलों ने तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है। खाड़ी देशों का आरोप है कि इन हमलों के पीछे सीधे तौर पर ईरान या उसके समर्थित लड़ाकों का हाथ है। अब तक संयम बरतने वाले अरब देशों ने संकेत दिया है कि वे अपनी संप्रभुता और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए 'ईंट का जवाब पत्थर से' देने की तैयारी कर रहे हैं। रक्षा मंत्रियों की एक आपात बैठक में सुरक्षा कूटनीति के साथ-साथ 'प्रिवेंटिव स्ट्राइक' (Pre-emptive Strike) की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई है।
अमेरिका और सहयोगियों की भूमिका हुई अहम
इस तनावपूर्ण स्थिति में अमेरिका की भूमिका एक बार फिर निर्णायक हो गई है। खाड़ी देशों ने वाशिंगटन से अपनी सुरक्षा गारंटी और अत्याधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम (जैसे 'पैट्रियट') की तैनाती बढ़ाने की मांग की है। वहीं, इजरायल भी इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाड़ी देश सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुनते हैं, तो उन्हें पश्चिमी देशों के सक्रिय समर्थन की आवश्यकता होगी। यह गठबंधन ईरान की सैन्य शक्ति को चुनौती देने के लिए एक 'संयुक्त टास्क फोर्स' बनाने पर भी विचार कर रहा है।
दुनिया भर में तेल संकट और आर्थिक मंदी का खतरा
यदि खाड़ी देशों और ईरान के बीच सीधे सैन्य टकराव की स्थिति बनती है, तो इसका सबसे बड़ा असर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों पर पड़ेगा। 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz), जहाँ से दुनिया का एक-तिहाई तेल गुजरता है, युद्ध का मुख्य केंद्र बन सकता है। भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह स्थिति किसी दुःस्वप्न से कम नहीं होगी। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी उछाल के साथ-साथ वैश्विक शेयर बाजारों में बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। दुनिया की निगाहें अब संयुक्त राष्ट्र (UN) और बड़े देशों की मध्यस्थता पर टिकी हैं ताकि इस संभावित महाविनाश को टाला जा सके।