राज्यपाल कठपुतली बन गए हैं? मल्लिकार्जुन खरगे ने मोदी सरकार पर साधा अब तक का सबसे तीखा निशाना
News India Live, Digital Desk : भारतीय राजनीति में इन दिनों एक अजीब सा ट्रेंड देखने को मिल रहा है। केंद्र सरकार और गैर-बीजेपी शासित राज्यों के बीच की तनातनी अब किसी से छिपी नहीं है। इसी माहौल के बीच, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (Mallikarjun Kharge) ने एक ऐसा बयान दे दिया है, जिसने सियासी गलियारों में बहस छेड़ दी है।
खरगे साहब ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधे तौर पर केंद्र की मोदी सरकार (Modi Govt) पर आरोप लगाया है कि वे राज्यपालों का इस्तेमाल 'कठपुतली' की तरह कर रहे हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर मामला क्या है? तो चलिए, इसे आसान भाषा में समझते हैं।
राज्यपालों की भूमिका पर सवाल क्यों?
दरअसल, खरगे का कहना है कि हमारे संविधान ने राज्यपाल (Governor) के पद को एक बेहद सम्मानजनक और स्वतंत्र दर्जा दिया है। उनका काम होता है संविधान की रक्षा करना और राज्य सरकार के साथ मिलजुलकर काम करना। लेकिन खरगे का आरोप है कि आजकल स्थिति बदल गई है।
उन्होंने कहा कि जो राज्यपाल विपक्ष शासित राज्यों में नियुक्त किए जा रहे हैं, वे संविधान के हिसाब से कम और केंद्र के इशारों पर ज्यादा काम कर रहे हैं। आसान शब्दों में कहें तो, आरोप यह है कि राजभवन का इस्तेमाल राज्य सरकारों को परेशान करने और विपक्ष को दबाने के लिए किया जा रहा है।
"कठपुतली" वाला तंज और संविधान की दुहाई
मल्लिकार्जुन खरगे ने अपने संबोधन में बहुत साफ शब्दों में कहा कि केंद्र सरकार राज्यपालों को अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले "एजेंट" के रूप में इस्तेमाल कर रही है। यह सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह हमारे देश के संघीय ढांचे (Federal Structure) पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।
उनका दर्द यह है कि चुनी हुई सरकारों को काम नहीं करने दिया जा रहा। जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार नहीं है, वहां राज्यपाल कथित तौर पर बिल पास करने में देरी करते हैं या सरकार के फैसलों में अड़ंगा डालते हैं। खरगे इसे लोकतंत्र और संविधान (Constitution) पर सीधा हमला मानते हैं।
आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है?
देखिए, जब "हाथी लड़ते हैं तो घास ही कुचली जाती है"। जब केंद्र और राज्य सरकार के बीच इस तरह का टकराव होता है, तो इसका असर विकास कार्यों पर पड़ता है। अगर राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच तालमेल नहीं होगा, तो जनता के लिए बनने वाले कानून अटक जाएंगे। खरगे की चिंता भी यही है कि राजनीति के इस खेल में संविधान की गरिमा को नहीं भूलना चाहिए।
कुल मिलाकर, मल्लिकार्जुन खरगे ने एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सत्ता पक्ष की तरफ से इस "कठपुतली" वाले आरोप पर क्या पलटवार आता है। लेकिन एक बात तो तय है लोकतंत्र में जब संस्थाओं की साख पर सवाल उठते हैं, तो जवाबदेही सबकी बनती है।