कन्या पूजन के लिए नहीं मिल रही हैं कन्याएं? परेशान न हों, इन 5 वैकल्पिक तरीकों से भी प्रसन्न होंगी मां दुर्गा
News India Live, Digital Desk : चैत्र नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्या पूजन का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, छोटी कन्याओं को साक्षात मां दुर्गा का रूप माना जाता है। लेकिन कई बार महानगरों में या व्यस्तता के कारण पूजन के लिए नौ कन्याओं का मिलना कठिन हो जाता है। ऐसे में श्रद्धालु असमंजस में पड़ जाते हैं कि उनका व्रत और पूजन पूर्ण होगा या नहीं। ज्योतिष शास्त्र और पुराणों में इस स्थिति के लिए कुछ बेहद सरल और प्रभावी विकल्प बताए गए हैं, जिनसे आप मां भगवती का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।
कन्याएं न मिलने पर अपनाएं ये 5 'दिव्य' विकल्प
अगर आपको अष्टमी या नवमी के दिन पूजन के लिए कन्याएं नहीं मिल पा रही हैं, तो आप इन विकल्पों को आजमा सकते हैं:
मंदिर में दान (Temple Donation): यदि घर पर कन्याएं नहीं आ पा रही हैं, तो आप नौ कन्याओं के हिस्से का भोजन, फल, दक्षिणा और उपहार (जैसे लाल चुनरी, चूड़ियां) पैकेट में तैयार कर लें। इसे पास के किसी देवी मंदिर में ले जाएं और वहां पुजारी को सौंप दें या मंदिर परिसर में मौजूद छोटी बच्चियों को वितरित कर दें।
गौ सेवा (Cow Service): हिंदू धर्म में गाय को 'गौ माता' कहा गया है, जिनमें सभी देवी-देवताओं का वास होता है। कन्या पूजन के विकल्प के रूप में आप नौ कन्याओं के हिस्से की पूड़ी, हलवा और चना किसी गाय को खिला सकते हैं। यह कार्य भी कन्या पूजन के समान ही पुण्यदायी माना जाता है।
भांजी या पड़ोस की बच्ची का पूजन: जरूरी नहीं कि आप नौ कन्याओं को ही बुलाएं। अगर आपके घर में एक ही कन्या है या आपकी भांजी है, तो आप उसी का पूर्ण श्रद्धा से पूजन करें। बाकी आठ कन्याओं के हिस्से की सामग्री और दक्षिणा किसी कन्या विद्यालय या अनाथालय में दान कर दें।
ब्राह्मण कन्या या निर्धन की सहायता: किसी ब्राह्मण की पुत्री या किसी अत्यंत निर्धन परिवार की बच्ची को भोजन कराना और उसकी शिक्षा में मदद करना मां दुर्गा को अति प्रिय है। आप उनके नाम का सीधा (कच्चा राशन और दक्षिणा) उनके घर पहुंचा सकते हैं।
मानसिक पूजन (Mental Worship): अगर आप ऐसी जगह हैं जहां कोई विकल्प संभव नहीं है, तो मां दुर्गा के सामने बैठकर नौ कन्याओं का ध्यान करें। उनके नाम का भोग निकालें और बाद में उस सामग्री को किसी सुहागिन महिला को भेंट कर दें या जल प्रवाहित कर दें।
कन्या पूजन का सही नियम और विधि
शास्त्रों के अनुसार, 2 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की कन्याओं का पूजन सबसे उत्तम माना गया है। पूजन से पहले उनके पैर धोएं, उन्हें साफ आसन पर बिठाएं, माथे पर कुमकुम का तिलक लगाएं और कलाई पर कलावा बांधें। भोजन में बिना लहसुन-प्याज के बना सात्विक हलवा, पूरी और काले चने का भोग लगाएं। विदाई के समय उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें और अपनी सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा जरूर दें।
एक बालक का होना क्यों है जरूरी?
कन्या पूजन के साथ एक बालक को बिठाने की भी परंपरा है, जिसे 'बटुक भैरव' या 'लंगूरा' कहा जाता है। माना जाता है कि बिना भैरव के मां दुर्गा की पूजा अधूरी रहती है। यदि बालक न मिले, तो हनुमान जी या भैरव जी के नाम का भोग अलग निकालकर रख दें और बाद में उसे किसी मंदिर में दे दें।