"ऑपरेशन सिंदूर" से लेकर पाकिस्तान को खरी-खरी... एस जयशंकर ने दुनिया को फिर समझाया 'भारत पहले' का मतलब

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भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर जब भी बोलते हैं, तो दुनिया बहुत ध्यान से सुनती है। वे अपनी बातों को घुमा-फिराकर नहीं, बल्कि बिल्कुल सीधे और स्पष्ट शब्दों में रखने के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उन्होंने दो ऐसी बातें कहीं, जिन्होंने एक बार फिर दुनिया को यह दिखा दिया है कि आज का भारत अपनी शर्तों पर चलता है और अपने लोगों की सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

एक तरफ उन्होंने पाकिस्तान को कड़ा संदेश दिया, तो वहीं दूसरी तरफ उन्होंने "ऑपरेशन सिंदूर" की एक ऐसी कहानी सुनाई, जिसने हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया।

क्या था "ऑपरेशन सिंदूर"?

यह नाम सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक बेहद भावुक और दिलेर रेस्क्यू ऑपरेशन की कहानी छिपी है। यह बात तब की है जब सूडान में गृह युद्ध छिड़ा हुआ था और हजारों भारतीय वहां फंस गए थे। भारत सरकार ने उन्हें निकालने के लिए "ऑपरेशन कावेरी" चलाया था।

जयशंकर ने बताया कि उस खतरनाक माहौल में जब वे भारतीयों को निकाल रहे थे, तो एक भारतीय महिला ने आने से इनकार कर दिया। कारण? वह अपनी सूडानी सहेली के बिना नहीं आना चाहती थी। उस सूडानी महिला के पति भी भारतीय थे, लेकिन उस वक्त वहां नहीं थे। उस सूडानी महिला को भारत का वीजा नहीं मिल पा रहा था।

ऐसे मुश्किल हालात में, भारतीय अधिकारियों ने एक अनोखा और दिलेर फैसला लिया। उन्होंने उस सूडानी महिला को भारत लाने के लिए सारे नियम बदल दिए, क्योंकि वह एक भारतीय की पत्नी थी, एक भारतीय परिवार की बहू थी। जयशंकर ने कहा, "यह हमारी परंपरा है... जब कोई लड़की हमारे यहां ब्याही जाती है, सिंदूर लगाती है, तो वह हमारी जिम्मेदारी बन जाती है।" उन्होंने मजाक में यह भी कहा कि शायद हमें ऑपरेशन कावेरी के अंदर एक "ऑपरेशन सिंदूर" भी चलाना पड़ा।

यह कहानी दिखाती है कि मोदी सरकार के लिए हर एक भारतीय और उनसे जुड़े रिश्ते कितने मायने रखते हैं।

पाकिस्तान पर फिर सुनाया दो टूक फैसला

भारत और पाकिस्तान के रिश्तों पर जयशंकर ने एक बार फिर भारत का स्टैंड बिल्कुल साफ कर दिया। जब उनसे पूछा गया कि क्या दोनों देशों के बीच कोई तीसरा देश मध्यस्थता कर सकता है, तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया।

उन्होंने साफ शब्दों में कहा, "भारत और पाकिस्तान के मुद्दे द्विपक्षीय हैं, यानी ये हमारे और उनके बीच के मामले हैं, और इन्हें हम दोनों ही सुलझाएंगे। इसमें किसी तीसरे की कोई जगह नहीं है।"

उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत अब किसी भी देश के दबाव में आकर फैसले नहीं लेता। हम वही करते हैं जो हमारे देश और हमारे लोगों के हित में होता है। इसे ही 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' यानी 'रणनीतिक स्वायत्तता' कहते हैं। उनका संदेश साफ था - आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते, और दुनिया को अब यह बात समझ लेनी चाहिए।

एस. जयशंकर के इन बयानों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आज का भारत एक मजबूत, आत्मनिर्भर और संवेदनशील देश है, जो अपने सिद्धांतों और अपने लोगों के लिए मजबूती से खड़ा होना जानता है।