ओबीसी से अब एसटी? झारखंड में बियार जाति के लिए छिड़ी एक नई उम्मीद की किरण, जानें क्या है पूरा मामला
News India Live, Digital Desk: झारखंड की मिट्टी अपनी संस्कृति और जनजातीय पहचान के लिए जानी जाती है। यहाँ कई जातियाँ ऐसी हैं जो सालों से अपनी असली पहचान और संवैधानिक हकों के लिए लड़ रही हैं। आज एक ऐसी ही बड़ी खबर 'बियार' (Biyar) समुदाय की ओर से आ रही है। अगर आप इस समुदाय से जुड़े हैं या झारखंड की राजनीति की समझ रखते हैं, तो आपको पता होगा कि 'बियार' जाति को अनुसूचित जनजाति (ST) की श्रेणी में शामिल करने की मांग कितनी पुरानी है।
अब खबर ये है कि इस दिशा में राज्य सरकार ने एक ठोस कदम बढ़ाया है। डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान (TRI) को अब इस जाति की सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक स्थिति का अध्ययन करने की ज़िम्मेदारी दी गई है।
आखिर ये सर्वे क्यों है ज़रूरी?
वर्तमान में 'बियार' जाति झारखंड की ओबीसी (OBC) लिस्ट में आती है। लेकिन समाज के भीतर और कई संगठनों का यह कहना है कि उनकी संस्कृति, रहन-सहन और जड़ें आदिवासियों से मिलती हैं। सरकार और कोर्ट के नियमों के मुताबिक, किसी भी जाति को एसटी का दर्जा तभी मिल सकता है जब उसकी एक ठोस 'नृवंशविज्ञान' (Ethnography) रिपोर्ट सामने आए। यही वो रिपोर्ट है जिसे अब रामदयाल मुंडा संस्थान तैयार करने जा रहा है।
उम्मीदें और चुनौतियाँ
हज़ारों बियार परिवारों की उम्मीदें अब इस रिपोर्ट पर टिकी हैं। अगर संस्थान का अध्ययन ये साबित कर देता है कि बियार समुदाय के लक्षण और इतिहास जनजातीय समाज से मेल खाते हैं, तो आगे का रास्ता बहुत आसान हो जाएगा।
इससे न केवल उन्हें सरकारी नौकरियों और शिक्षा में बेहतर आरक्षण (Reservation) मिलेगा, बल्कि उन्हें अपनी खोई हुई पहचान वापस पाने का एक सम्मानजनक जरिया भी मिलेगा। हालाँकि, ये रास्ता इतना सरल नहीं है। विशेषज्ञों को कई मापदंडों को जांचना होगा जैसे उनका खान-पान, रीति-रिवाज़ और पुरानी परंपराएं।
आगे क्या होगा?
अभी इस सर्वे के लिए टीमें गांवों में जाएंगी, लोगों से बातचीत करेंगी और डेटा इकट्ठा करेंगी। टीआरआई (TRI) की रिपोर्ट ही यह तय करेगी कि झारखंड सरकार केंद्र को इसके लिए सिफारिश भेजेगी या नहीं। कुल मिलाकर, बियार समाज के लिए यह समय बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक 'हां' या 'ना' उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बदल सकती है।