बीजेपी के लिए 2026 सिर्फ एक साल नहीं, बल्कि अस्तित्व की जंग है, बंगाल से केरल तक की इन चुनौतियों को समझिये
News India Live, Digital Desk : बीजेपी की चुनावी मशीनरी को करीब से देखने वाले जानते हैं कि पार्टी कभी आराम नहीं करती। लेकिन 2026 कुछ अलग है। उत्तर भारत के राज्य, जो बीजेपी का पावरहाउस रहे हैं, वहाँ अब 'पीक' पर बने रहने की चुनौती है। उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान और मध्य प्रदेश तक, पार्टी को एंटी-इंकम्बेंसी और क्षेत्रीय मुद्दों के बीच अपनी जगह बचाए रखनी है। यह काम दिखने में जितना आसान लगता है, असल में उतना ही मुश्किल है, क्योंकि जनता अब नए चेहरों और काम का रिपोर्ट कार्ड मांग रही है।
दक्षिण का कठिन 'दरवाज़ा'
अक्सर चर्चा होती है कि बीजेपी हिंदी भाषी राज्यों में तो सुपरपावर है, लेकिन विंध्य पर्वतमाला के दक्षिण में जाते ही समीकरण क्यों बदल जाते हैं? तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में पार्टी सालों से पसीना बहा रही है। 2026 में यहाँ के विधानसभा चुनावों या संगठनात्मक परिवर्तनों में पार्टी का 'मिशन साउथ' कसौटी पर होगा। स्थानीय संस्कृति और भाषा के मुद्दों पर अक्सर विपक्ष यहाँ बीजेपी को घेरता आया है। ऐसे में बीजेपी अपनी हिंदुत्व वाली छवि और विकास के दावों के साथ कितना सामंजस्य बैठा पाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।
बंगाल और असम: पूरब की जंग अभी बाकी है
पश्चिम बंगाल एक ऐसा मोर्चा है जहाँ हारने के बाद भी बीजेपी ने अपनी मौजूदगी को बेहद मजबूत किया है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ बीजेपी का मुकाबला केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक भी बन गया है। 2026 में यहाँ की राजनीतिक हवाएं यह बताएंगी कि क्या जनता अब विकल्प की तलाश में है? वहीं दूसरी ओर, असम में पार्टी के पास अपने 'मॉडल' को और मजबूती से स्थापित करने की चुनौती है।
सिर्फ वोट नहीं, नैरेटिव की लड़ाई
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि 2026 का साल केवल संख्या बल का खेल नहीं होगा। यह इस बात का फैसला करेगा कि बीजेपी का 'एक देश-एक एजेंडा' क्या वाकई देशभर में स्वीकार्य है? विपक्ष ने भी अब मुद्दों की जगह रणनीतिक गठबंधनों पर काम करना शुरू कर दिया है, जिससे बीजेपी की राह पहले जैसी आसान नहीं रह गई है।
निष्कर्ष यह है कि 2026 बीजेपी के लिए किसी बड़ी बाधा दौड़ (Hurdle Race) से कम नहीं है। पार्टी को उत्तर में अपने घर की छत गिरानी नहीं है और दक्षिण में नई दीवार खड़ी करनी है। यह संतुलन साधने में वे कितने सफल होते हैं, इसी पर 2029 की भी तस्वीर साफ होगी।