Evolution of Telecom : जब फोन स्मार्ट नहीं थे, लेकिन बातें दिल से होती थीं ,टेलीकॉम का वो दौर जो अब लौटकर नहीं आएगा
News India Live, Digital Desk: आज जब हमारे हाथ में 5G वाले चमचमाते स्मार्टफोन्स हैं और हम घंटो रील स्क्रॉल करते हैं, तो कभी-कभी मन करता है कि थोड़ा पीछे मुड़कर देखा जाए। आज की पीढ़ी (Gen-Z) को शायद यकीन भी न हो, लेकिन हममें से बहुत से लोगों ने वो दौर जिया है जब फोन जेब में नहीं, बल्कि मोहल्ले की नुक्कड़ पर एक पील रंग के डब्बे (PCO) में हुआ करता था।
आज चलिए थोड़ा 'रिवाइंड' का बटन दबाते हैं और उस दौर की सैर करते हैं, जब बात करना सस्ता नहीं, एक 'इवेंट' हुआ करता था।
वो पीला डब्बा और 1 रुपये की कद्र
आज वीडियो कॉल पर शक्ल दिख जाती है, लेकिन उस पीली छत वाले PCO Booth की बात ही कुछ और थी। याद है? जेब में खुले चिल्लर (सिक्के) लेकर जाना और एसटीडी (STD) कॉल का मीटर भागते हुए देखकर दिल की धड़कन तेज होना। और सबसे बुरा तब लगता था जब बात अधूरी रह जाए और ऑपरेटर बोले- "भैया, टाइम हो गया, लाइन लगी है पीछे!" वो लाइन, वो इंतजार और वो एक रुपये के सिक्के की खन-खन सब एक मीठी याद है।
हल्लो आवाज आ रही है? (Incoming के भी पैसे)
आज के बच्चों को बताओ तो वो हंस पड़ते हैं, लेकिन यह सच है। एक ऐसा जमाना था जब अगर आपके पास फोन आया है, तो उसे उठाने और सुनने के भी पैसे कटते थे (Incoming Charges)। 16 रुपये प्रति मिनट तक का रेट था भाई! तब फोन की घंटी बजने पर लोग खुश नहीं होते थे, बल्कि डर जाते थे कि "यार बैलेंस कट जाएगा।" इसीलिए, लोग अक्सर फोन काट देते थे और PCO से कॉल बैक करते थे।
'मिस कॉल' वाली सीक्रेट भाषा
आज मिस कॉल का मतलब है कॉल मिस हो जाना। उस जमाने में मिस कॉल एक पूरी भाषा थी।
- "मैं घर पहुँच गया हूँ" (1 मिस कॉल)।
- "मुझे कॉल करो" (2 मिस कॉल)।
कंजूसी नहीं थी जनाब, मजबूरी थी! बैलेंस बचाने का यह सबसे स्मार्ट तरीका था जो भारतीयों ने ईजाद किया था।
नाखून से रगड़कर किस्मत आजमाना
आज Google Pay से एक सेकंड में रिचार्ज हो जाता है। उस वक्त दुकान पर जाकर कूपन मांगना, उसे ध्यान से सिक्के या नाखून से खुरचना (Scratch Card) और फिर उन 16 अंकों को डालते हुए यह दुआ करना कि "गलत न दब जाए"... वो भी अलग ही रोमांच था। और अगर गलती से नंबर ज्यादा रगड़ गया और मिट गया, तो जो गुस्सा आता था, वो बयां नहीं किया जा सकता।
छोटा रिचार्ज और लाइफटाइम खुशियां
वो 10 रुपये या 9 रुपये वाला 'छोटा रिचार्ज' याद है? उसे कराकर ऐसा लगता था जैसे दुनिया जीत ली हो। और फिर आई थी 'लाइफ टाइम इनकमिंग' फ्री वाली स्कीम्स। कतारों में लगकर सिम खरीदी गई थीं।
सच कहें तो, आज सुविधाएं बहुत हैं, नेट फ़ास्ट है, दुनिया मुट्ठी में है। लेकिन उस धीमी दुनिया का, उन छोटे Nokia फोन्स का और उन PCO बूथों का सुकून आज के स्मार्टफोन्स में कहीं खो गया है।