EVM हैकर या भरोसेमंद? कर्नाटक में हुए इस ताज़ा सर्वे ने कांग्रेस के भीतर ही खलबली मचा दी है
News India Live, Digital Desk: चुनावों के समय जब भी नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आते, तो एक शब्द जो सबसे ज्यादा सुनाई देता है, वो है EVM (Electronic Voting Machine)। लंबे समय से कांग्रेस नेता राहुल गांधी बार-बार ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते आए हैं। उनका कहना रहा है कि ईवीएम एक 'ब्लैक बॉक्स' की तरह है, जिसे नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन ताज्जुब की बात तब हो गई जब खुद उनकी अपनी ही पार्टी की सरकार वाले राज्य यानी कर्नाटक से कुछ अलग ही रिपोर्ट सामने आ गई।
दरअसल, कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार की देखरेख में एक सर्वे कराया गया। आमतौर पर जब विपक्ष में बैठे नेता ईवीएम पर उंगली उठाते हैं, तो सरकारें उसे टाल देती हैं। लेकिन यहाँ कहानी थोड़ी पलट गई है। खबर आ रही है कि कर्नाटक सरकार द्वारा कराए गए इस व्यापक सर्वे के नतीजे राहुल गांधी के उन दावों से काफी मेल नहीं खाते, जो वह पिछले कुछ सालों से हर चुनाव के बाद करते रहे हैं।
क्या कहते हैं सर्वे के आँकड़े?
कर्नाटक में जो डेटा निकलकर सामने आया है, उसके अनुसार आम जनता और वोटर्स के बीच ईवीएम को लेकर वो अविश्वास नहीं है, जिसका जिक्र अक्सर दिल्ली की प्रेस कॉन्फ्रेंस में होता है। सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि एक बड़ी आबादी अभी भी मतदान की इस प्रक्रिया को सुरक्षित और पारदर्शी मानती है। अब यहाँ बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस की रणनीति में कहीं कोई बड़ी 'कमी' रह गई है या फिर ज़मीनी हकीकत उस शोर-शराबे से कोसों दूर है जिसे सोशल मीडिया पर फैलाया जाता है।
अंदरुनी राजनीति और विरोधाभास
राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा आम हो गई है कि जब अपनी ही पार्टी की राज्य सरकार की मशीनरी ऐसे नतीजे पेश करती है, जो केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ जाएं, तो स्थिति थोड़ी असहज (awkward) हो जाती है। राहुल गांधी पिछले काफी समय से चुनाव आयोग और ईवीएम की पारदर्शिता पर हमलावर रहे हैं। लेकिन अगर कर्नाटक जैसे राज्य के लोग इस मशीन पर भरोसा दिखा रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर कांग्रेस के 'EVM नैरेटिव' को कमजोर कर देता है।
सोशल मीडिया बनाम ज़मीनी सच्चाई
अक्सर हम देखते हैं कि ट्विटर (अब X) और टीवी डिबेट्स में ईवीएम हैक होने की बातें जोर-शोर से चलती हैं। मगर जब गाँव और शहरों में लोगों से बात की जाती है, तो उनकी चिंताएं अलग होती हैं—बेरोजगारी, महंगाई और विकास। कर्नाटक के इस सर्वे ने यह भी इशारा किया है कि लोग हार-जीत का श्रेय या दोष मशीन को देने के बजाय अपनी पसंद और स्थानीय मुद्दों को अधिक तवज्जो देते हैं।
अंत में, यह मामला अब सिर्फ चुनाव का नहीं बल्कि पार्टी के अंदर 'बयानों के तालमेल' का भी है। अब देखना यह होगा कि राहुल गांधी अपने इन पुराने दावों पर टिके रहते हैं या फिर उनकी अपनी पार्टी के राज्यों से आई ऐसी रिपोर्ट्स उनके सुर को थोड़ा धीमा करेंगी।