'द वन' रिव्यू: छठी मैया की महिमा और वन देवी के रहस्य में उलझी सिद्धार्थ-तमन्ना की फिल्म

'द वन' रिव्यू: छठी मैया की महिमा और वन देवी के रहस्य में उलझी सिद्धार्थ-तमन्ना की फिल्म

भारतीय सिनेमा में पिछले कुछ वर्षों से लोककथाओं, क्षेत्रीय मान्यताओं और अलौकिक शक्तियों पर आधारित कहानियों का एक बड़ा चलन देखने को मिला है। हमारी दादी-नानी के दौर से चली आ रही वे कहानियां—जिनमें एक रक्षक देवी होती थी और एक ऐसा भयावह दैत्य जो जंगल की सीमाओं को लांघने वालों को अपना शिकार बना लेता था—हमेशा से सिनेप्रेमियों को आकर्षित करती रही हैं। इसी लोकप्रिय फॉकलोर और रहस्यमयी अवधारणा को आधुनिक सांचे में ढालने के उद्देश्य से इस हफ्ते सिनेमाघरों में रिलीज हुई है सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया अभिनीत फिल्म 'द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' (The Vvaan: Force of the Forest)। फिल्म को लेकर दर्शकों और समीक्षकों के बीच भारी उत्सुकता थी, क्योंकि इसका निर्माण बालाजी मोशन पिक्चर्स और बहुचर्चित कंटेंट क्रिएटर टीवीएफ (TVF) मोशन पिक्चर्स ने संयुक्त रूप से किया है। लेकिन क्या यह महत्वाकांक्षी फिल्म भारतीय लोक आस्था, छठी मैया की भक्ति और वन देवी के अलौकिक रोमांच को सही तालमेल के साथ पर्दे पर उतार पाई है? आइए इस विस्तृत समीक्षा में समझते हैं कि फिल्म कहां खरी उतरती है और किन मोर्चों पर दर्शकों को निराश करती है।

मुंबई की चकाचौंध से देवांचल के जंगलों तक: क्या है फिल्म की मूल कहानी

फिल्म की पटकथा आधुनिक हॉरर, कॉमेडी और पौराणिक फंतासी (मायथोलॉजी) के विभिन्न रंगों को एक ही धागे में पिरोने की कोशिश करती है। कहानी का आरंभ देश की वित्तीय राजधानी मुंबई से होता है, जहां आधुनिक विचारों वाला कॉरपोरेट युवा ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) अपनी संस्कारी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ सुकून भरी जिंदगी बिता रहा होता है। दोनों अपने दांपत्य जीवन में माता-पिता बनने की सुखद उम्मीद संजोए हुए हैं। इसी बीच अचानक गांव से ऋषि के बड़े भाई (अनूप सोनी) का फोन आता है, जो उन्हें पुश्तैनी जमीन के बंटवारे और एक बड़े सौदे के लिए तत्काल गांव देवांचल पहुंचने को कहता है। गांव में वन देवी के संरक्षित जंगल के भीतर से एक बड़ी सड़क परियोजना निकालने और उसके एवज में जमीन बेचने की योजना चल रही होती है। ऋषि स्वभाव से ईश्वर और पारंपरिक मान्यताओं में बिल्कुल यकीन नहीं रखता, लेकिन ममता किसी तरह अपने नास्तिक पति को लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा के बहाने गांव चलने के लिए राजी कर लेती है। ऋषि के साथ उसका मुंहफट और मजाकिया दोस्त वी.पी. (मनीष पॉल) भी सफर पर निकल पड़ता है।

आस्था बनाम अंधा विकास: वन देवी के शापित जंगल का खौफनाक रहस्य

जैसे ही यह शहरी दल देवांचल गांव की सीमा में प्रवेश करता है, कहानी में कॉर्पोरेट लालच और स्थानीय राजनीति का खेल शुरू हो जाता है। इस पूरे षड्यंत्र के पीछे गांव का शातिर विलेन दीपक (सुनील ग्रोवर) सक्रिय होता है, जो जंगल की जमीन बेचकर भारी मुनाफा कमाना चाहता है। ऋषि देवी-देवताओं और चमत्कारों पर भरोसा नहीं करता, इसलिए वह भी विकास की अंधी दौड़ में दीपक के साथ हाथ मिला लेता है। उसकी इस भौतिकवादी सोच से उसकी परंपरावादी भाभी सुशीला (श्वेता तिवारी) सख्त नाराज हो जाती हैं। देवांचल के ग्रामीणों में सदियों से यह अटूट मान्यता है कि वन देवी के घने जंगल में जो भी व्यक्ति सूर्यास्त के बाद कदम रखता है, वह कभी जीवित वापस नहीं लौटता। अब एक तरफ वर्षों पुरानी धार्मिक परंपराएं हैं और दूसरी तरफ सड़क निर्माण का आधुनिक लालच। अंततः हठधर्मिता में ऋषि स्वयं उस शापित और निषिद्ध जंगल के भीतर प्रवेश कर जाता है, जिसके बाद अप्रत्याशित और अलौकिक घटनाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है।

दो समानांतर ट्रैक में भटकती कहानी: आस्था और सस्पेंस का बेमेल कॉकटेल

फिल्म के पहले हाफ में निर्देशक किरदारों को स्थापित करने और गांव के रहस्यमयी माहौल को बुनने में कुछ हद तक सफल रहते हैं। लेकिन जैसे ही कहानी दूसरे भाग में प्रवेश करती है, पटकथा बुरी तरह डगमगाने लगती है। मेकर्स ने एक साथ 'दो देवियों' के ट्रैक को चलाने का बहुत बड़ा जोखिम उठाया—एक तरफ वन देवी के जंगल का अलौकिक और खौफनाक रहस्य चल रहा होता है, तो दूसरी तरफ पूर्वांचल की अटूट आस्था के प्रतीक महापर्व छठ मैया की व्रत साधना का अध्याय समानांतर दिखाया जाता है। समस्या यह है कि ये दोनों ही ट्रैक एक-दूसरे में स्वाभाविक रूप से घुलने के बजाय आपस में टकराते हुए नजर आते हैं। बार-बार आने वाले गैर-जरूरी ट्विस्ट और टर्न्स कहानी के ठहराव को खत्म कर देते हैं। दर्शक अंत तक इस असमंजस में फंसे रहते हैं कि वे पर्दे पर छठी मैया की निर्मल भक्ति से जुड़ें या फिर जंगल के किसी हॉरर थ्रिलर का आनंद लें। क्लाइमेक्स तक पहुंचते-पहुंचते सारी उम्मीदें बिखर जाती हैं और अंत बेहद साधारण और अतार्किक प्रतीत होता है।

'पंचायत' के दीपक कुमार मिश्रा का निर्देशन: सिनेमाई कैनवास पर क्यों लगा 'डेली सोप' का झटका?

इस फिल्म के निर्देशन की बागडोर संभाली थी 'पंचायत' जैसी कल्ट और कालजयी वेब सीरीज का निर्देशन करने वाले दीपक कुमार मिश्रा ने। दीपक ने ओटीटी की दुनिया में अपनी सादगी और जमीनी पकड़ से लाखों दिलों को जीता था, लेकिन बड़े पर्दे के 70 एमएम कैनवास पर उनका निर्देशन बेहद कमजोर और दिशाहीन नजर आता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वे एक साथ कई शैलियों को साधने के चक्कर में फिल्म की मूल आत्मा ही भूल गए। जमीन विवाद का कोर्ट-कचहरी ड्रामा, वन देवी का सुपरनैचुरल हॉरर, छठ मैया की धार्मिक आस्था, संयुक्त परिवार का आपसी क्लेश और इन सबके बीच जबरन ठूंसी गई सिचुएशनल कॉमेडी—सबकुछ एक साथ परोसने के कारण फिल्म खिचड़ी बनकर रह जाती है। संपादन (एडिटिंग) के स्तर पर भी फिल्म बेहद लचर है, जहां दृश्य एक-दूसरे से सहजता से नहीं जुड़ते। कई भावनात्मक दृश्य देखने में किसी लंबे और मेलोड्रामैटिक टीवी सीरियल (डेली सोप) जैसा अहसास कराते हैं। छठ महापर्व जैसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी केवल एक प्लॉट डिवाइस की तरह इस्तेमाल किया गया, जिसमें बिहार की जमीनी खुशबू और सांस्कृतिक गहराई का पूरी तरह अभाव दिखाई देता है।

स्टारकास्ट का प्रदर्शन: सिद्धार्थ-तमन्ना की केमिस्ट्री और सहयोगी कलाकारों का काम

अभिनय के मोर्चे पर कलाकारों ने अपने स्तर पर पूरा प्रयास किया है, लेकिन कमजोर लेखन ने उनके परफॉर्मेंस को सीमित कर दिया। सिद्धार्थ मल्होत्रा एक शहरी, आधुनिक युवा के रूप में स्क्रीन पर काफी सहज और आकर्षक लगते हैं। उनका एक्शन सीक्वेंस और तमन्ना भाटिया के साथ स्क्रीन केमिस्ट्री अच्छी दिखती है, लेकिन जब कहानी उन्हें एक देहाती परिवेश के भावनात्मक द्वंद्व में धकेलती है, तो उनकी पकड़ ढीली पड़ती नजर आती है। तमन्ना भाटिया के पास फिल्म में छठी मैया का निर्जला व्रत करने और पूजा की थाली उठाने के अलावा कोई ठोस स्क्रीन टाइम या मजबूत कैरेक्टर आर्क नहीं था, हालांकि भावुक पलों में वे काफी गरिमामयी लगी हैं। नकारात्मक भूमिका में सुनील ग्रोवर का चुनाव थोड़ा अजीब लगता है; एक हास्य अभिनेता के रूप में स्थापित सुनील विलेन के रूप में कोई वास्तविक खौफ पैदा नहीं कर पाते। मनीष पॉल ने अपनी जानी-पहचानी कॉमिक टाइमिंग से कुछ दृश्यों में जान फूंकने की कोशिश की, लेकिन दोहराव भरे जोक्स अंततः थका देते हैं। श्वेता तिवारी ने भाभी के संजीदा किरदार में बेहतरीन काम किया है, लेकिन उनका रोल बहुत छोटा रहा। वहीं अनूप सोनी और पंडित की भूमिका में आए मिलिंद गुणाजी अपनी सीमित मौजूदगी में ठीक-ठाक प्रभाव छोड़ते हैं।

अंतिम फैसला: क्या सिनेमाघरों में टिकट खरीदना फायदे का सौदा है

अरुणाभ कुमार द्वारा सोची गई कहानी की मूल अवधारणा निश्चित रूप से आशाजनक थी, जिसमें भारतीय संस्कृति के दो अनछुए पहलुओं को जोड़ने का विचार था। संगीतकार द्वारा तैयार किया गया बैकग्राउंड स्कोर भी कुछ दृश्यों में रहस्य को गहरा करने में मदद करता है। परंतु कमजोर स्क्रीनप्ले, ढीले निर्देशन और जबरन खींचे गए मेलोड्रामा ने इस फैंटेसी-थ्रिलर की पूरी चमक फीकी कर दी है। यदि आप सिद्धार्थ मल्होत्रा या तमन्ना भाटिया के डाई-हार्ड फैन हैं और केवल विजुअल्स के लिए थिएटर जाना चाहते हैं, तो एक बार इसे देखा जा सकता है। लेकिन यदि आप 'कांतारा' या 'तुम्बाड' जैसी किसी रोंगटे खड़े कर देने वाली रस्टिक माइथोलॉजिकल मास्टरपीस की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो 'द वन' आपको काफी हद तक निराश कर सकती है।