1966 के केरल हत्याकांड पर बनी फिल्म 'द कंफेशन ऑफ मेरी' की इंटरनेशनल स्तर पर धूम, पादरी के रूप में नजर आएंगे नाना पाटेकर

1966 के केरल हत्याकांड पर बनी फिल्म 'द कंफेशन ऑफ मेरी' की इंटरनेशनल स्तर पर धूम, पादरी के रूप में नजर आएंगे नाना पाटेकर

भारतीय सिनेमा की पहुंच आज वैश्विक मंचों पर लगातार मजबूत होती जा रही है, और देश की अनकही व संवेदनशील वास्तविक कहानियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी प्रशंसा बटोर रही हैं। इसी गौरवशाली कड़ी में राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार और अभिनेता अनंत महादेवन (Ananth Mahadevan) की नई और बहुचर्चित निर्देशित फिल्म 'द कंफेशन ऑफ मेरी' (The Confession of Mary) का टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (TIFF) में आधिकारिक तौर पर प्रीमियर संपन्न हुआ है। केरल के साल 1966 के एक चर्चित और रोंगटे खड़े कर देने वाले खौफनाक हत्याकांड पर आधारित इस फिल्म में दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर (Nana Patekar) ने एक पादरी की बेहद जटिल और अनूठी भूमिका निभाई है। इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर फिल्म को मिले शानदार रिस्पॉन्स और भारतीय सिनेमा के सौ साल से अधिक के गौरवशाली इतिहास को लेकर फिल्म जगत में उत्साह का माहौल है। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस बहुप्रतीक्षित फिल्म के पीछे की अनसुनी दास्तान और इसके निर्माण से जुड़ी खास बातें क्या हैं।

टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में गूंजा 'द कंफेशन ऑफ मेरी' का डंका

भारतीय कला और सिनेमा के लिए यह बेहद गर्व का क्षण है कि अनंत महादेवन के निर्देशन में बनी फिल्म 'द कंफेशन ऑफ मेरी' का प्रीमियर प्रतिष्ठित टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के वैश्विक मंच पर किया गया। हिंदी सिनेमा के विशालकाय इतिहास और इसकी बढ़ती अंतरराष्ट्रीय पहुंच पर बात करते हुए निर्देशक अनंत महादेवन ने हाल ही में अपने विचार साझा किए। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि हिंदी भाषा हमारे देश में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली और लोकप्रिय भाषा है, जिसका सौ वर्षों से भी अधिक पुराना और समृद्ध इतिहास रहा है। देश-विदेश के कई जाने-माने कलाकार अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले अपने उच्चारण और भाषा को पूरी तरह साफ करने के लिए हिंदी फिल्मों को देखते हैं। महादेवन ने अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा करते हुए बताया कि वह खुद भी अपनी फिल्मों की कहानियां और स्क्रिप्ट हमेशा हिंदी में ही लिखना पसंद करते हैं, क्योंकि जिस भाषा में आप कला का सृजन करते हैं, उस पर आपकी वैचारिक और भाषाई पकड़ मजबूत होनी बेहद जरूरी है।

सत्य घटनाओं पर आधारित फिल्मों का निर्माण और 1966 के केरल हत्याकांड की रोंगटे खड़े करने वाली पृष्ठभूमि

काल्पनिक कहानियों के मुकाबले वास्तविक जीवन की घटनाओं और सच्ची आपराधिक वारदातों पर फिल्म बनाना कितना चुनौतीपूर्ण होता है, इस पर प्रकाश डालते हुए अनंत महादेवन ने बताया कि फिक्शन यानी काल्पनिकता को पर्दे पर उतारना अधिक कठिन होता है, क्योंकि उसके लिए हर एक तर्क और कहानी को गढ़ना पड़ता है। इसके विपरीत, इतिहास के पन्नों में दर्ज 'सच' हमेशा काल्पनिक चीजों से कहीं अधिक अनोखा और प्रभावशाली होता है। सच को दर्शाते वक्त निर्देशक को अपने मन से कुछ नया गढ़ने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि जो घटित हुआ है उसे प्रामाणिकता के साथ पर्दे पर उतारना होता है। यह फिल्म केरल में साल 1966 में घटी एक दिल दहला देने वाली वास्तविक घटना पर आधारित है, जिसमें एक चर्च के पादरी को अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाई गई थी। इस बेहद संवेदनशील और जटिल विषय पर फिल्म बनाते वक्त निर्देशक के सामने उस दौर के माहौल और वास्तुकला को जीवंत करना सबसे बड़ी चुनौती थी।

शूटिंग के दौरान 1960 के दशक के माहौल को जीवंत करने के लिए गोवा में हुई फिल्म की शूटिंग

साल 1966 के उस पुराने दौर को आज के आधुनिक समय में पर्दे पर हूबहू उतारना किसी लोहे के चने चबाने से कम नहीं था। निर्देशक ने बताया कि जब उन्होंने केरल में शूटिंग करने की सोची, तो आधुनिक विकास और वर्तमान दौर की चीजें फ्रेम में आ रही थीं जिन्हें विजुअल इफेक्ट्स (VFX) की मदद से हटाना असंभव सा प्रतीत हो रहा था। उस कालखंड के पारंपरिक घर, प्राचीन फर्नीचर और ऐतिहासिक चर्चों की सही वास्तुकला को ढूंढने के लिए आखिरकार टीम ने केरल के बजाय पुराने गोवा (Old Goa) में फिल्म की शूटिंग करने का निर्णय लिया। गोवा की प्राचीन और पारंपरिक वास्तुकला ने उस दौर के माहौल को पर्दे पर बहुत ही प्रामाणिक ढंग से जीवंत कर दिया। निर्देशक का मानना है कि इस फिल्म में केरल से जुड़ी ऐसी कई सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परतें छिपी हैं, जो सिनेमाघरों में आने वाले हर वर्ग के दर्शकों को गहराई से अपनी ओर आकर्षित करेंगी और अंत तक सीट से बांधे रखेंगी।

फेस्टिवल फिल्मों की धारणा को तोड़ने का प्रयास और मनोरंजन की एक नई और परिपक्व परिभाषा

अक्सर यह माना जाता है कि अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स के लिए बनाई जाने वाली फिल्में कमर्शियल बॉक्स ऑफिस के फॉर्मूले से कोसों दूर होती हैं और आम दर्शकों को रास नहीं आती हैं। इस प्रचलित मिथक और धारणा को सिरे से खारिज करते हुए अनंत महादेवन ने कहा कि यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि फेस्टिवल की फिल्म आम जनता के बीच नहीं चल सकती। यदि फेस्टिवल से इतनी ही असुविधा होती, तो दुनिया भर के बड़े-बड़े निर्माता अपनी कमर्शियल फिल्मों को भी अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाने के लिए क्यों दौड़ते? अपनी फिल्मों में सामाजिक संदेश और मनोरंजन का सटीक संतुलन बिठाने के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे देश में 'मनोरंजन' शब्द की परिभाषा को बहुत गलत तरीके से समझ लिया गया है। मनोरंजन का मतलब केवल अकारण कॉमेडी करना या स्क्रीन पर धड़ल्ले से मारधाड़ दिखाना नहीं होता है। सच्चा मनोरंजन वह है जो दर्शक को सिनेमा हॉल की कुर्सी पर इस कदर बांधे रखे कि वह ढाई घंटे तक पलकें तक न झपका सके।

नाना पाटेकर को दिया गया बिल्कुल विपरीत और शांत किरदार, ऋषिकेश मुखर्जी से मिली सही कास्टिंग की सीख

इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी इसके मुख्य कलाकार नाना पाटेकर (Nana Patekar) हैं, जिन्हें दर्शक हमेशा से उनके आक्रामक, ऊर्जावान और तेज-तर्रार अभिनय के लिए जानते आए हैं। लेकिन इस फिल्म में अनंत महादेवन ने उनके साथ एक बड़ा प्रयोग करते हुए उन्हें एक बिल्कुल विपरीत और शांत स्वभाव के पादरी की भूमिका सौंपी है। जब नाना पाटेकर को यह शांत किरदार ऑफर किया गया, तो उन्होंने बिना एक पल गंवाए तुरंत इसके लिए हामी भर दी, क्योंकि हर मंझा हुआ कलाकार लीक से हटकर कुछ नया करने की भूख रखता है। फिल्म का रफ कट देखने के बाद खुद नाना पाटेकर ने भी स्वीकार किया कि इस तरह के रोल ने उनके भीतर छिपे एक अलग ही अभिनेता को बाहर निकाला है। अपनी फिल्मों के लिए हमेशा सटीक और परफेक्ट कास्टिंग करने के महत्व पर बात करते हुए निर्देशक ने बताया कि उन्हें यह अमूल्य सीख भारतीय सिनेमा के महान फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी से मिली थी। ऋषिकेश दा ने उन्हें हमेशा यही सिखाया था कि फिल्मों में स्टारडम के पीछे भागने के बजाय हमेशा कहानी की मांग के अनुसार सही और प्रामाणिक अभिनेताओं से ही काम करवाना चाहिए। अगर आप सिर्फ किसी बड़े स्टार को फिल्म में फिट करने के लिए समझौता करते हैं, तो यह सीधे तौर पर कला और कथा के साथ एक बड़ी बेइमानी होगी।