बॉलीवुड के संगीत उद्योग पर बरसीं श्रेया घोषाल: 'पुरुष-प्रधान मानसिकता और जेंडर पूर्वाग्रह से जूझ रही है इंडस्ट्री'

बॉलीवुड के संगीत उद्योग पर बरसीं श्रेया घोषाल: 'पुरुष-प्रधान मानसिकता और जेंडर पूर्वाग्रह से जूझ रही है इंडस्ट्री'

पांच बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुकीं और भारतीय संगीत जगत में अपनी जादुई आवाज से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली पार्श्व गायिका श्रेया घोषाल ने हिंदी सिनेमा के संगीत ढांचे पर एक बेहद गंभीर और विचारणीय बहस छेड़ दी है। अपने दो दशक से अधिक लंबे शानदार करियर में सैकड़ों कालजयी गीतों को अपनी आवाज देने वाली श्रेया घोषाल ने हाल ही में दिए एक स्पष्ट और बेबाक साक्षात्कार में बॉलीवुड को 'गहराई से पुरुष-प्रधान' (Male-Dominated) और 'पितृसत्तात्मक' (Patriarchal) करार दिया है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में फिल्मों का संगीत निर्माण जिस तरह से हो रहा है, उसमें महिला गायिकाओं के साथ खुला जेंडर आधारित पूर्वाग्रह देखने को मिलता है। अमूमन विवादों से दूर रहने वाली और केवल अपने सुर-साधना पर केंद्रित रहने वाली श्रेया घोषाल के इस तीखे बयान ने हिंदी फिल्म उद्योग, म्यूजिक लेबल्स, संगीत निर्देशकों और फिल्म निर्माताओं के बीच हड़कंप मचा दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी गहरी जड़ें जमा चुकी व्यवस्था है जिसमें महिला कलाकारों की उपस्थिति को जानबूझकर हाशिए पर धकेला जा रहा है।

'गानों में 2-3 लाइनें देकर निपटा दिया जाता है': फीमेल सिंगर्स के घटते स्पेस पर दर्द

श्रेया घोषाल ने आज के बॉलीवुड गानों के स्ट्रक्चर पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि वर्तमान समय में बनने वाले अधिकांश रोमांटिक या कमर्शियल गानों में महिला गायिकाओं की भूमिका को बेहद सीमित कर दिया गया है। पहले जहां युगल गीतों (Duets) में महिला और पुरुष दोनों गायकों को बराबर अंतरे और बोल मिलते थे, वहीं आज के दौर में 4 मिनट के गाने में साढ़े तीन मिनट तक सिर्फ पुरुष गायक की आवाज गूंजती है और महिला गायिका को केवल गाने के अंत में दो या तीन लाइनें या केवल बैकग्राउंड आलाप (Humming) गाने के लिए बुला लिया जाता है। कई बार तो ऐसा भी देखा गया है कि पूरे गाने को पुरुष गायक से रिकॉर्ड कराने के बाद केवल कोरस या पोस्ट-हुक में फीमेल वॉइस का इस्तेमाल एक औपचारिकता पूरी करने के लिए किया जाता है। श्रेया ने सवाल उठाया कि जब देश में एक से बढ़कर एक प्रतिभाशाली महिला गायिकाएं मौजूद हैं, जो किसी भी जटिल राग और ऊंचे सुरों को साधने की असीम क्षमता रखती हैं, तो फिर उन्हें मुख्यधारा के एल्बमों में बराबरी का हक और सम्मानजनक स्पेस क्यों नहीं दिया जा रहा है।

लता मंगेशकर और आशा भोसले के सुनहरे दौर से आज तक: कैसे बदल गया संगीत का फलसफा?

श्रेया घोषाल के इस बयान ने संगीत प्रेमियों को उस दौर की याद दिला दी है जब हिंदी सिनेमा का पूरा संगीत जगत स्वर कोकिला लता मंगेशकर, आशा भोसले, गीता दत्त, शमशाद बेगम और बाद में अल्का याग्निक, अनुराधा पौडवाल व कविता कृष्णमूर्ति जैसी दिग्गज महिला गायिकाओं के इर्द-गिर्द घूमता था। 1950 से लेकर 1990 के दशक तक फिल्मों में सोलो फीमेल ट्रैक (महिला एकल गीत) फिल्म की सफलता की गारंटी माने जाते थे। 'अजीब दास्तां है ये', 'लग जा गले', 'पिया तू अब तो आजा' से लेकर 'दिल दीवाना' और 'ताल से ताल मिला' जैसे दर्जनों ऐसे गाने हैं जो पूरी तरह महिला स्वरों पर आधारित थे और जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रचा।

लेकिन 2010 के बाद से बॉलीवुड के संगीत परिदृश्य में एक ऐसा मोड़ आया जहां महिला प्रधान गाने लगभग गायब होने लगे। आज की अधिकांश बड़ी फिल्मों के एल्बमों में 5 से 6 ट्रैक होते हैं, जिनमें से 4 गाने पूरी तरह मेल सिंगर्स के सोलो होते हैं और बचे हुए 2 गानों में भी महिला गायिकाओं की मौजूदगी नाममात्र की होती है। इस ऐतिहासिक बदलाव को रेखांकित करते हुए श्रेया ने चिंता जताई कि यह केवल संगीत का बदलाव नहीं है, बल्कि यह समाज और सिनेमा के नजरिए का पतन है जहां महिलाओं के दृष्टिकोण और उनकी आवाज को कहानी से गायब किया जा रहा है।

'हीरो-सेंट्रिक' सिनेमा और म्यूजिक लेबल्स का अल्गोरिदम: कहां फंसा है पेंच?

इस जेंडर बायस की तह में जाने पर यह साफ नजर आता है कि बॉलीवुड में संगीत की दिशा का फैसला अब संगीतकार नहीं, बल्कि फिल्म के स्टार्स और बड़ी म्यूजिक कंपनियां कर रही हैं। मौजूदा दौर में हिंदी सिनेमा पर 100 करोड़ और 500 करोड़ के क्लब वाले 'मस्कुलर एक्शन ड्रामा' और 'लार्जर-देन-लाइफ हीरो' वाली फिल्मों का दबदबा है। इन फिल्मों में महिला किरदारों की भूमिका अक्सर केवल एक रोमांटिक साइड-किक तक सीमित होकर रह गई है। जब फिल्म की पटकथा में नायिका के पास कोई स्वतंत्र भावनात्मक यात्रा ही नहीं होती, तो स्वाभाविक रूप से उसके हिस्से कोई सोलो गाना भी नहीं लिखा जाता।

इसके अलावा, म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स और यूट्यूब के दौर में म्यूजिक लेबल्स 'अल्गोरिदम और डेटा' के आधार पर गाने डिजाइन कर रहे हैं। लेबल्स का यह रूढ़िवादी मानना बन चुका है कि पुरुष आवाज वाले सैड सॉन्ग्स या पार्टी ट्रैक्स सोशल मीडिया रील्स पर ज्यादा व्यूज और स्ट्रीम्स हासिल करते हैं। इसी कमर्शियल मुनाफे की अंधी दौड़ के चलते महिला एकल गीतों पर दांव लगाने से निर्माता कतराते हैं। श्रेया घोषाल ने इसी मानसिकता को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि कला को केवल गणित और बाजार के नजरिए से नहीं तौला जा सकता; जब आप आधी आबादी की आवाज को दबा देंगे तो संगीत में आत्मा और विविधता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।

सोना मोहापात्रा से सुनिधि चौहान तक: पहले भी उठी हैं आवाजें, लेकिन क्यों नहीं टूटा यह चक्रव्यूह?

बॉलीवुड की म्यूजिक इंडस्ट्री में महिला गायिकाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर आवाज उठाने वाली श्रेया घोषाल अकेली कलाकार नहीं हैं। इससे पहले मशहूर गायिका सोना मोहापात्रा ने कई मंचों पर खुलकर आरोप लगाया था कि बड़े-बड़े संगीत फेस्टिवल्स और बॉलीवुड एल्बमों में महिला कलाकारों को महज 10 से 15 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिलता है। सोना मोहापात्रा ने संगीत निर्देशकों और म्यूजिक कंपनियों की पुरुष मंडली (Boys Club) पर सवाल उठाते हुए कहा था कि कॉन्सर्ट्स में भी पुरुष गायकों को महिलाओं की तुलना में कई गुना अधिक फीस और प्राइम टाइम स्लॉट दिए जाते हैं।

इसी तरह दमदार आवाज की मल्लिका सुनिधि चौहान और नेहा भसीन ने भी समय-समय पर इस बात को स्वीकार किया है कि इंडस्ट्री में आज फीमेल सोलो गानों का भारी अकाल पड़ चुका है। हालांकि, जब तक कोई कलाकार इंडस्ट्री में अपने शुरुआती संघर्ष के दौर में होता है, तब तक काम छिन जाने के डर से कोई भी इस व्यवस्था के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। लेकिन अब जब श्रेया घोषाल जैसी शीर्ष और निर्विवाद रूप से सबसे सम्मानित गायिका ने सीधे तौर पर 'पितृसत्ता' शब्द का इस्तेमाल कर इस मुद्दे को छेड़ा है, तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पानी अब सिर से ऊपर निकल चुका है।

पारिश्रमिक और क्रेडिट में भी बड़ा अंतर: क्या इंडिपेंडेंट म्यूजिक बनेगा नया सहारा?

जेंडर बायस का यह खेल सिर्फ गानों की लाइनों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पारिश्रमिक (Pay Parity) और क्रेडिट रोल में भी गहराई से दिखाई देता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, एक ही स्तर के अनुभव और लोकप्रियता के बावजूद पुरुष गायकों को प्रति गाने मिलने वाली फीस और लाइव कॉन्सर्ट्स के लिए मिलने वाला मानदेय महिला गायिकाओं से काफी अधिक होता है। इसके अलावा गानों के पोस्टर, थंबनेल और प्रोमोशन में भी अक्सर पुरुष गायक और मेल एक्टर्स को ही प्रमुखता से दर्शाया जाता है, जबकि महिला गायिका का नाम अक्सर बारीक अक्षरों में कहीं नीचे दबा दिया जाता है।

बॉलीवुड के इस घुटन भरे माहौल के बीच अब कई प्रतिभाशाली महिला गायिकाएं फिल्मों के दरवाजे खटखटाने के बजाय 'इंडिपेंडेंट म्यूजिक' (गैर-फिल्मी स्वतंत्र संगीत) का रास्ता चुन रही हैं। डिजिटल युग में यूट्यूब, स्पॉटिफाई और ऐप्पल म्यूजिक जैसे प्लेटफॉर्म्स ने कलाकारों को यह आजादी दी है कि वे बिना किसी फिल्म निर्माता या म्यूजिक माफिया की दया के अपने दम पर सोलो एल्बम रिलीज कर सकें। श्रेया घोषाल, जो खुद भी कई स्वतंत्र प्रोजेक्ट्स और क्षेत्रीय भाषाओं में काम कर रही हैं, का मानना है कि यदि बॉलीवुड ने अपनी सोच में सुधार नहीं किया, तो बेहतरीन महिला प्रतिभाएं फिल्म जगत से पूरी तरह किनारा कर लेंगी। उनका यह बयान फिल्म निर्माताओं के लिए एक चेतावनी है कि वे भारतीय सिनेमा की समृद्ध सांगीतिक विरासत को चंद पुरुषों की जागीर बनने से बचाएं और नारी शक्ति की आवाज को उसका वाजिब सम्मान लौटाएं।