700 साल पुरानी अमीर खुसरो की गजल से बना Lata Mangeshkar का कालजयी गीत, 41 साल से कल्ट बने इस गाने का असली मतलब

700 साल पुरानी अमीर खुसरो की गजल से बना Lata Mangeshkar का कालजयी गीत, 41 साल से कल्ट बने इस गाने का असली मतलब

भारतीय सिनेमा और हिंदी संगीत जगत में कई ऐसे नग्मे रचे गए हैं जो पीढ़ियों की सरहदों को लांघकर अमर हो जाते हैं, लेकिन ऑस्कर व ग्रैमी विजेता महान गीतकार गुलजार साहब ने चार दशक पहले एक ऐसा नायाब शाहकार रचा जिसकी जड़ें आज से 100 या 200 साल नहीं, बल्कि सात सदियों पुराने समृद्ध इतिहास से जुड़ी हुई हैं। वर्ष 1985 में जब दिग्गज फिल्मकार जे. पी. दत्ता के निर्देशन में बनी ब्लॉकबस्टर एक्शन-ड्रामा फिल्म 'गुलामी' रिलीज हुई, तो उसके एक गीत ने पूरे हिंदुस्तान को अपनी रूहानी धुन पर झूमने के लिए मजबूर कर दिया था। यह गीत कोई और नहीं, बल्कि स्वर कोकिला भारत रत्न लता मंगेशकर और मशहूर पाश्वगायक शब्बीर कुमार की सुरीली आवाज में रिकॉर्ड किया गया कालजयी ट्रैक 'जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन बरंजिश' था। बीते 41 वर्षों से भारतीय संगीत प्रेमियों की प्लेलिस्ट में निर्विवाद रूप से शीर्ष पर विराजमान यह गाना दरअसल 14वीं सदी के महान सूफी फकीर, शायर और संगीतकार अमीर खुसरो की एक अत्यंत दुर्लभ और ऐतिहासिक रचना की अमर पंक्तियों से प्रेरित होकर तराशा गया था।

14वीं सदी के अमीर खुसरो की फारसी-ब्रज जुगलबंदी से गुलजार का जादुई सफर

चौदहवीं शताब्दी के प्रख्यात सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया के सबसे चहेते मुरीद और 'तूतिए-हिंद' के नाम से विख्यात अमीर खुसरो ने अपनी प्रसिद्ध गजल में भाषाई प्रयोग की एक अनोखी मिसाल कायम की थी, जिसमें एक पंक्ति फारसी जुबान में और दूसरी पंक्ति ठेठ ब्रजभाषा यानी हिंदवी में लिखी गई थी। खुसरो का मूल मिसरा था—'जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन तगाफुल, दुराए नैना बनाए बत्तियां; कि ताब-ए-हिज्रां नदारम ऐ जां, न लेहो काहे लगाए छतियां', जिसका अर्थ था कि मेरी बेबसी को नजरअंदाज मत करो, आंखें चुराकर बातें मत बनाओ। गुलजार साहब ने इसी सात सौ साल पुरानी शास्त्रीय विरासत से मुख्य मुखड़े की रूह को उठाया और फिल्म 'गुलामी' की प्रेम कहानी व पटकथा की जरूरत के अनुसार उसमें थोड़ा रचनात्मक फेरबदल करते हुए नया अंतरा बुना—'जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन बरंजिश, बहाल-ए-हिज्रां बेचारा दिल है; सुनाई देती है जिसकी धड़कन, तुम्हारा दिल या हमारा दिल है', जिसे संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने अपने मनमोहक संगीत से सजाकर सदाबहार बना दिया।

पर्दे पर मिथुन और अनीता राज की केमिस्ट्री, फिर बॉलीवुड में रीमिक्स का नया दौर

रेगिस्तान की तपती रेत और सामंती जुल्म के खिलाफ बगावत की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्म 'गुलामी' में जब यह नग्मा सुपरस्टार मिथुन चक्रवर्ती और खूबसूरत अदाकारा अनीता राज पर फिल्माया गया, तो दर्शकों ने पर्दे पर प्रेम और लाचारी का अद्भुत संगम महसूस किया। जे. पी. दत्ता के निर्देशन में बनी इस मल्टी-स्टारर फिल्म में धर्मेंद्र, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा, स्मिता पाटिल, रीना रॉय, रजा मुराद और ओम शिवपुरी जैसे दिग्गज कलाकारों की लंबी फौज मौजूद थी, लेकिन इस रोमांटिक गीत ने फिल्म को एक संवेदनशील भावनात्मक गहराई प्रदान की। 41 साल पहले रिलीज हुआ यह कल्ट सॉन्ग आज के डिजिटल युग में भी उतना ही प्रासंगिक है, जिसका प्रमाण यह है कि आधुनिक बॉलीवुड संगीतकारों ने इसके कई नए रीमिक्स और रीक्रिएटेड वर्जन भी तैयार किए, जो आज की युवा पीढ़ी और सोशल मीडिया रील्स पर भी लगातार ट्रेंड करते रहते हैं।

'जिहाल-ए-मिस्कीं' का असली शाब्दिक अर्थ: प्रेमी की बेबसी और हिज्र का गहरा दर्द

चार दशकों से यह गाना हर भारतीय संगीत प्रेमी की जुबां पर तो चढ़ा हुआ है, लेकिन फारसी और उर्दू के क्लिष्ट शब्दों के चलते बहुत कम लोग इसके छिपे हुए रूहानी व भावनात्मक अर्थ से वाकिफ हैं। इस गीत में 'जिहाल' शब्द 'हाल' से निकला है जिसका अर्थ 'हालत या दशा' होता है, वहीं 'मिस्कीं' का शाब्दिक अर्थ 'दीन, लाचार, गरीब अथवा बेचारा' है, और 'बरंजिश' का आशय 'नाराजगी, रंजिश या दूरी' से होता है। अतः पूरी पंक्ति 'जिहाल-ए-मिस्कीं मकुन बरंजिश' का सीधा मतलब यह है कि "मेरी बेबसी, लाचारी और दयनीय हालत को देखते हुए मुझसे खफा मत हो और मुझसे कोई बैर या रंजिश मत रखो।" इसी प्रकार अगली कड़ी 'बहाल-ए-हिज्रां बेचारा दिल है' में 'हिज्र' का अर्थ 'जुदाई या विरह' है, जिसका भाव यह है कि "जुदाई के असहनीय दर्द और विरह की तपन से मेरा बेचारा दिल पहले से ही लहूलुहान और बुरी हालत में है।" संक्षेप में समझें तो यह एक ऐसे तड़पते हुए प्रेमी की दर्दभरी गुहार है जो अपनी महबूबा से विनती करता है कि वह उसकी बेबसी को समझे और उस पर अपनी बेरुखी का सितम न ढाए।