Electoral Trust Funding : चंदे की रेस में BJP ने मारी बाजी, मिला कुल फंड का 82%; जानें कांग्रेस के खाते में कितना आया?

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News India Live, Digital Desk: भारत की राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे (Donations) के आंकड़े सामने आ गए हैं, और इस बार भी भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अन्य सभी दलों को पीछे छोड़ दिया है। इलेक्टोरल ट्रस्ट (Electoral Trusts) के जरिए होने वाली फंडिंग में बीजेपी को सबसे बड़ा हिस्सा मिला है, जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस (Congress) काफी पीछे नजर आ रही है।

फंडिंग का गणित: किसे मिला कितना हिस्सा?

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, इलेक्टोरल ट्रस्ट्स को कॉर्पोरेट घरानों और बड़े दानदाताओं से जो पैसा मिला, उसका वितरण कुछ इस तरह रहा:

बीजेपी का दबदबा: कुल चंदे का लगभग 82% हिस्सा अकेले बीजेपी के खाते में गया है। यह आंकड़ा पार्टी की मजबूत पकड़ और कॉर्पोरेट जगत के भरोसे को दर्शाता है।

कांग्रेस की स्थिति: सबसे पुरानी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस को केवल 7% चंदा ही मिल सका।

अन्य क्षेत्रीय दल: बाकी का 11% हिस्सा अन्य क्षेत्रीय पार्टियों और छोटे दलों के बीच बंटा है।

इलेक्टोरल ट्रस्ट क्या है और यह कैसे काम करता है?

इलेक्टोरल ट्रस्ट एक ऐसी व्यवस्था है जिसके जरिए कंपनियां राजनीतिक दलों को चंदा देती हैं। यह पारदर्शिता बनाए रखने के लिए बनाया गया था ताकि यह पता चल सके कि किस कंपनी ने कितना पैसा दिया, हालांकि इसमें चुनावी बॉन्ड (Electoral Bonds) जैसा विवाद नहीं रहा है।

कॉर्पोरेट जगत की पसंद क्यों है बीजेपी?

जानकारों का मानना है कि सत्ताधारी दल होने के नाते और औद्योगिक नीतियों के कारण बड़े कॉर्पोरेट घराने बीजेपी को अधिक फंड देना पसंद करते हैं।

स्थिरता: कंपनियां अक्सर उस पार्टी को सपोर्ट करती हैं जिसकी सरकार स्थिर हो।

व्यापारिक नीतियां: केंद्र सरकार की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं का असर भी फंडिंग पर दिखता है।

लोकतंत्र के लिए इसके क्या मायने हैं?

विपक्ष अक्सर आरोप लगाता है कि फंडिंग में इतनी बड़ी असमानता से चुनाव प्रचार के दौरान 'लेवल प्लेइंग फील्ड' यानी समान अवसर खत्म हो जाते हैं। आर्थिक रूप से मजबूत पार्टी के पास प्रचार और संसाधनों की अधिक ताकत होती है।