जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा क्या इम्पीचमेंट से बचने के लिए छोड़ा पद? जानें अब पेंशन और बेनिफिट्स का क्या होगा
News India Live, Digital Desk: 'कैश-एट-होम' (घर में कैश) विवाद के बाद सुर्खियों में आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजे अपने पत्र में 'गहरे दुख' (Deep Anguish) के साथ तत्काल प्रभाव से पद छोड़ने की बात कही है। जस्टिस वर्मा के खिलाफ संसद में हटाने (हटाने की प्रक्रिया या महाभियोग) की कार्यवाही तेज हो रही थी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस इस्तीफे के बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ चल रही संसदीय कार्यवाही अब 'निरर्थक' (Infructuous) हो जाएगी।
इस्तीफे के पीछे की असली 'रणनीति'
जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लोकसभा में करीब 146 सांसदों ने उन्हें पद से हटाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। उनके सरकारी आवास पर आग बुझाने के दौरान करोड़ों की नकदी मिलने के आरोप थे। जानकारों का कहना है कि यदि उन्हें संसद द्वारा हटाया जाता, तो वे अपने संवैधानिक पद की गरिमा के साथ-साथ रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले सभी लाभों से भी हाथ धो बैठते। लेकिन पद से इस्तीफा देने के बाद अब वे एक 'सेवानिवृत्त न्यायाधीश' की तरह पेंशन के हकदार बने रहेंगे।
क्या अब भी मिलेगी पूरी पेंशन?
भारतीय कानून और संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार, यदि कोई न्यायाधीश कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा देता है, तो वह पेंशन और अन्य ग्रेच्युटी लाभों का पात्र होता है। जस्टिस यशवंत वर्मा ने संसदीय जांच पूरी होने और वोटिंग होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया है, जिससे तकनीकी रूप से उनके रिटायरमेंट बेनिफिट्स (पेंशन, मेडिकल सुविधा आदि) सुरक्षित हो गए हैं। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, यदि संसद उन्हें 'कदाचार' का दोषी मानकर हटा देती, तो वे किसी भी सरकारी लाभ के पात्र नहीं रह जाते।
'कैश-एट-होम' कांड जिसने हिला दी न्यायपालिका
यह पूरा मामला मार्च 2025 का है, जब जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर आग लग गई थी। आग बुझाने पहुंचे दमकल कर्मियों ने कथित तौर पर वहां नोटों के ढेर देखे थे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने इन-हाउस जांच बैठाई और जस्टिस वर्मा का न्यायिक कार्य वापस लेते हुए उन्हें इलाहाबाद ट्रांसफर कर दिया गया। हालांकि, जस्टिस वर्मा इन आरोपों को सिरे से खारिज करते रहे हैं और उनका कहना है कि यह पैसा उनका नहीं था।
अब आगे क्या? प्राइवेट सिटिजन पर चल सकता है केस
संवैधानिक पद से इस्तीफा देने के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा अब एक आम नागरिक बन गए हैं। इसका मतलब है कि अब उनके पास वह 'संवैधानिक सुरक्षा कवच' नहीं है जो एक जज के पास होता है। कानून के जानकारों का कहना है कि अब सरकार या जांच एजेंसियां चाहें तो उनके खिलाफ भ्रष्टाचार या बेहिसाब संपत्ति के मामले में नियमित आपराधिक कार्यवाही (Criminal Proceedings) शुरू कर सकती हैं। इस्तीफा केवल संसद की कार्यवाही को रोक सकता है, कानून के लंबे हाथों को नहीं।