Delhi Air Quality Index : यह सिर्फ़ धुंध नहीं, हमारी घटती उम्र का अलार्म है, दिल्ली के प्रदूषण की दिल दहला देने वाली सच्चाई
News India Live, Digital Desk: सांस लेने में दिक्कत हो रही है... आँखों में जलन है... पर अब किसे फ़र्क पड़ता है?" ये शब्द सिर्फ़ एक इंसान के नहीं, बल्कि आज दिल्ली में रहने वाले लाखों लोगों की बेबसी और गुस्से की कहानी बयां करते हैं। हर साल की तरह इस साल भी दिल्ली 'गैस चैंबर' बन चुकी है, जहाँ सांस लेना एक सज़ा की तरह लगता है। लेकिन इस बार लोगों के सब्र का बांध टूटता दिख रहा है।
सड़क पर सुबह टहलने निकले एक बुज़ुर्ग से पूछो तो कहते हैं, "बेटा, दस साल हो गए ये ज़हर झेलते-झेलते। सरकारें आती हैं, जाती हैं, हमारी उम्र घटती जाती है।" उनका दर्द साफ़ झलकता है। हाल यह है कि दिल्ली-एनसीआर के लगभग 69 फीसद परिवार प्रदूषण से जुड़ी किसी न किसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं। किसी को गले में खराश है, तो किसी की आँखों से पानी नहीं रुक रहा।
सड़कों पर गुस्सा, सेहत पर हमला
हालत इतनी खराब हो चुकी है कि अब लोग इंडिया गेट जैसी जगहों पर प्रदर्शन करने को मजबूर हो गए हैं। "हम यहाँ मर रहे हैं और सरकार आंकड़े छिपा रही है," एक प्रदर्शनकारी का यह बयान बताता है कि लोगों का व्यवस्था से भरोसा उठ चुका है। प्रदूषण अब सिर्फ़ एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रहा; यह एक स्वास्थ्य आपातकाल बन गया है। डॉक्टर बताते हैं कि अस्पतालों में सांस के मरीज़ों की संख्या बढ़ गई है। प्रदूषण अब सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं है, यह दिल, दिमाग और यहाँ तक कि किडनी पर भी असर डाल रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में हर 7 में से एक मौत की वजह यही ज़हरीली हवा है।
आम ज़िंदगी का संघर्ष
स्कूल जाने वाले बच्चों की माँ हो या ऑफिस के लिए निकलने वाला नौजवान, हर कोई परेशान है। एक महिला ने कहा, "बच्चों के स्वास्थ्य की चिंता खाए जा रही है। हर तीसरे बच्चे के फेफड़े कमज़ोर हो चुके हैं।" लोग काम पर जाते हैं, लेकिन शरीर में ऑक्सीजन की कमी के चलते थकान और चिड़चिड़ापन महसूस करते हैं।
सरकारें हर साल बड़े-बड़े वादे करती हैं, एंटी-स्मॉग गन से लेकर सड़कों पर पानी के छिड़काव तक, लेकिन ज़मीनी हकीकत जस की तस है। एक नागरिक ने कहा, "यह कोई राजनीतिक मामला नहीं है। यह साफ़ हवा का मामला है, जो हमारा संवैधानिक अधिकार है।"
दिल्ली की हवा में घुला यह ज़हर अब लोगों के जीवन का एक कड़वा हिस्सा बन चुका है। लोग अब समाधान का इंतज़ार करते-करते थक चुके हैं और बस यही कह रहे हैं - “कोई तो हमारी सुने, क्योंकि सांसें अब जवाब दे रही हैं।”