डूंगरपुर में विकास पर बहस या सियासी वर्चस्व की जंग? जब आमने-सामने आ गए सांसद राजकुमार रोत और मन्नालाल रावत
News India Live, Digital Desk : आजकल की राजनीति में मुलाकातों के पीछे मुस्कुराहट कम और चुनौतियां ज्यादा नज़र आती हैं। राजस्थान के डूंगरपुर में हाल ही में जिला विकास समन्वय और निगरानी समिति (DISHA) की बैठक हुई। वैसे तो यह मीटिंग सरकारी योजनाओं के रिव्यू के लिए होती है, ताकि जनता तक फायदा पहुँच सके, लेकिन यहाँ की हवाओं में कुछ अलग ही कड़वाहट महसूस की गई। बैठक का मुख्य आकर्षण (या कहें विवाद) बने उदयपुर के बीजेपी सांसद मन्नालाल रावत और बांसवाड़ा-डूंगरपुर के बीएपी (BAP) सांसद राजकुमार रोत।
आखिर बात बिगड़ी कहाँ?
डूंगरपुर और बांसवाड़ा का ये इलाका हमेशा से अपनी शांति के लिए जाना जाता रहा है, पर जब से क्षेत्रीय राजनीति में भारत आदिवासी पार्टी (BAP) का उदय हुआ है, तब से यहाँ पुरानी और नई सियासत के बीच रस्साकशी बढ़ गई है। मीटिंग के दौरान विकास कार्यों और बजट को लेकर चर्चा शुरू हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह चर्चा आरोप-प्रत्यारोप में बदल गई।
जानकारों का कहना है कि बात प्रोटोकॉल और योजनाओं के श्रेय को लेकर शुरू हुई। मन्नालाल रावत जहाँ बीजेपी के विकास मॉडल को सामने रख रहे थे, वहीं राजकुमार रोत ने क्षेत्र के हक और हकूक को लेकर सवाल खड़े कर दिए। बहस इतनी बढ़ गई कि अफसरों के बीच बैठे दोनों माननीय एक-दूसरे पर काफी तीखी टिप्पणियां करते नज़र आए।
वजह सिर्फ 'विकास' नहीं, बल्कि 'वोट' भी है
सच्चाई यह है कि दक्षिण राजस्थान की आदिवासी राजनीति अब एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। बीजेपी को यहाँ अपनी खोई हुई ज़मीन बचानी है, तो वहीं राजकुमार रोत अपनी युवा छवि और आक्रामक राजनीति से इसे बढ़ाना चाहते हैं। दिशा की बैठक तो बस एक ज़रिया बनी, असली संघर्ष तो इस क्षेत्र के 'राजनीतिक मुखिया' बनने का है।
सांसद मन्नालाल रावत का अपना रुतबा है, लेकिन राजकुमार रोत को मिली भारी जनसमर्थन की लहर ने बीजेपी के रणनीतिकारों को भी चिंता में डाल दिया है। यही तनाव इस मीटिंग में साफ तौर पर शब्दों के रूप में फूट पड़ा।
आम जनता पर क्या पड़ेगा इसका असर?
दो बड़े नेताओं का आपस में उलझना सुर्ख़ियों के लिए तो अच्छा हो सकता है, लेकिन डूंगरपुर की आम जनता जो पानी, बिजली और रोज़गार की उम्मीद में अपनी आँखें गड़ाए बैठी है, उसके लिए यह दृश्य थोड़ा परेशान करने वाला है। विकास कार्यों की निगरानी के लिए बनी बैठक अगर आपसी वर्चस्व की भेंट चढ़ जाए, तो फाइलों की धूल झाड़ने का काम अधर में लटक जाता है।
देखना दिलचस्प होगा कि साल 2026 की शुरुआत के साथ यह राजनीतिक टकराव थमता है या फिर दक्षिण राजस्थान की इन वादियों में बीजेपी और बीएपी के बीच यह 'अदृश्य युद्ध' और भीषण रूप लेगा।