Constitutional Amendment : जनप्रतिनिधियों की शुचिता ,दागी नेताओं पर प्रस्तावित कानून और आगे का रास्ता

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News India Live, Digital Desk:  Constitutional Amendment : भारतीय राजनीति में जनजीवन की शुचिता को बनाए रखने के उद्देश्य से मोदी सरकार ने हाल ही में तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए हैं, जिनका लक्ष्य दागी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को उनके पदों से हटाना है. इन विधेयकों में यह प्रावधान है कि यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, या मंत्री किसी गंभीर आपराधिक आरोप में लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहता है, तो उसे उसके पद से हटा दिया जाएगा. सरकार का तर्क है कि ये विधेयक सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और नैतिकता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर केवल स्वच्छ छवि वाले जनप्रतिनिधि ही रहें. इसका एक प्रमुख उद्देश्य यह भी है कि गंभीर आरोपों का सामना करने वाले व्यक्ति जनता के भरोसे को तोड़कर जेल से सरकार न चला सकें

मौजूदा कानूनों के अनुसार, जनप्रतिनिधियों को आम तौर पर केवल दोषी ठहराए जाने के बाद ही पद से हटाया जा सकता है, जैसा कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 में उल्लिखित है. हालांकि, प्रस्तावित नए विधेयक में दोषसिद्धि से पहले ही पद से हटाने का प्रावधान शामिल किया गया है, जो इस पहल को विशेष बनाता है यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है क्योंकि यह वर्तमान कानूनी ढांचे से परे जाकर उन नेताओं को हटाने की अनुमति देता है जिन पर गंभीर आरोप हैं, भले ही उनका मुकदमा अभी चल रहा हो.

दूसरी ओर, विपक्ष ने इन विधेयकों पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है और उन्हें 'कठोर', 'असंवैधानिक' तथा सत्ता का दुरुपयोग करने और विरोधी दलों के नेतृत्व वाली सरकारों को अस्थिर करने का प्रयास बताया है. विपक्ष का आरोप है कि इन विधेयकों का दुरुपयोग विरोधियों को झूठे मामलों में फंसाकर जेल में रखने के लिए किया जा सकता है, जिससे वे बिना दोष सिद्ध हुए ही अपने पदों से हट जाएं. लोकसभा में इन विधेयकों को पेश किए जाने के दौरान भारी हंगामा भी देखा गया, जहां विपक्षी सांसदों ने जोरदार विरोध किया

फिलहाल, इन तीनों विधेयकों को आगे की विस्तृत चर्चा और समीक्षा के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया है समिति इस पर विचार-विमर्श करेगी और उसके बाद ही इसका भविष्य तय होगा. इस कानून को पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और कम से कम 50% राज्यों की साधारण बहुमत से सहमति की आवश्यकता होगी.यह दिखाता है कि यह कानून एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन है जिसका दूरगामी प्रभाव भारतीय राजनीति पर पड़ सकता है. इस मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष के बीच गरमागरम बहस जारी है, जो लोकतंत्र और जवाबदेही के सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाने की जटिलता को दर्शाती है.

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