बस्तर के ऐतिहासिक 'मुरिया दरबार' में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की शिरकत
छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पटल पर एक बेहद गौरवशाली और ऐतिहासिक क्षण आने वाला है, जो देश भर के लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। अपनी अनूठी संस्कृति, लोक परंपराओं और सदियों पुरानी आदिवासी जीवनशैली के लिए पूरी दुनिया में अपनी एक खास पहचान रखने वाला विश्व प्रसिद्ध 'बस्तर दशहरा' इस बार और भी अधिक खास होने जा रहा है। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में मनाए जाने वाले इस 75 दिनों तक चलने वाले अनोखे दशहरे के सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम पड़ाव यानी 'मुरिया दरबार' (Muria Darbar) में इस बार देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करने जा रही हैं। राष्ट्रपति के बस्तर दौरे और इस पारंपरिक दरबार में शामिल होने की खबर से न केवल स्थानीय आदिवासियों में भारी उत्साह और उल्लास का माहौल है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी सुरक्षा और मेहमाननवाजी की चाक-चौबंद तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
क्या है 'मुरिया दरबार'? जानिए इस सदियों पुरानी आदिवासी लोकतांत्रिक परंपरा का पूरा इतिहास
'मुरिया दरबार' कोई साधारण सभा या बैठक नहीं है, बल्कि यह देश की सबसे पुरानी और जीवंत आदिवासी लोकतांत्रिक परंपराओं में से एक है, जो बस्तर की रियासत काल से चली आ रही है। सामान्य तौर पर जहां पूरे देश में दशहरे का मतलब रावण दहन होता है, वहीं बस्तर में रावण दहन की कोई परंपरा नहीं है, बल्कि यहां मां दंतेश्वरी की आराधना और सत्य की जीत का पर्व मनाया जाता है। बस्तर दशहरे के समापन के ठीक एक दिन बाद आयोजित होने वाले इस 'मुरिया दरबार' में बस्तर के कोने-कोने से मांझी, चालकी, पाटा और विभिन्न परगना के पारंपरिक आदिवासी मुखिया और प्रतिनिधि बड़ी संख्या में एकत्रित होते हैं। इस दरबार की सबसे बड़ी और खास विशेषता यह है कि इसमें राजा, प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि एक आम चौपाल की तरह बैठते हैं, जहां आदिवासी समाज के लोग अपनी समस्याएं, क्षेत्रीय मुद्दे, जल-जंगल-जमीन से जुड़े विषय और अपने पारंपरिक सुझाव सीधे खुलकर साझा करते हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बस्तर आगमन और आदिवासी संस्कृति के सम्मान का अनूठा संदेश
देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बस्तर के इस पारंपरिक 'मुरिया दरबार' में शामिल होना भारत के जनजातीय समाज और उनकी संस्कृति के लिए एक बहुत बड़ा सम्मान माना जा रहा है। राष्ट्रपति अपने इस दौरे के दौरान न सिर्फ बस्तर की समृद्ध लोक कला और परंपराओं से रूबरू होंगी, बल्कि वे सीधे आदिवासी जननायकों और स्थानीय लोगों से संवाद भी करेंगी। आदिवासी अधिकारों, उनकी संस्कृति के संरक्षण और क्षेत्र के विकास के दृष्टिकोण से इस आयोजन को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जब देश की प्रथम नागरिक बस्तर की माटी पर पहुंचकर इस ऐतिहासिक दरबार की शोभा बढ़ाएंगी, तो इससे वैश्विक स्तर पर बस्तर की संस्कृति और उसकी लोकतांत्रिक परंपराओं का मान और अधिक बढ़ जाएगा। स्थानीय प्रशासन और बस्तर के लोग राष्ट्रपति के स्वागत के लिए पलक-पावड़े बिछाए बैठे हैं और इस भव्य आयोजन को ऐतिहासिक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरे का समापन और बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर का वैश्विक महत्व
बस्तर दशहरा अपनी 75 दिनों की लंबी अवधि के कारण दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला दशहरा उत्सव माना जाता है, जिसमें रथ परिक्रमा, काछन गादी, जोगी बिठाई और कुंवारी पूजा जैसे कई बेहद दुर्लभ और पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं। इन सभी भव्य अनुष्ठानों के बाद 'मुरिया दरबार' ही वह अंतिम ऐतिहासिक कड़ी होती है जिसके साथ इस महाकुंभ का औपचारिक समापन होता है। यह दरबार इस बात का प्रतीक है कि बस्तर के आदिवासी समाज में आज भी संवाद, आपसी सहमति और लोकतांत्रिक मूल्यों को कितना ऊंचा स्थान दिया जाता है। इस बार राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की उपस्थिति ने इस पारंपरिक आयोजन के महत्व को कई गुना बढ़ा दिया है। छत्तीसगढ़ का यह पावन अवसर न केवल बस्तर के गौरवशाली अतीत को जीवंत करता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि आधुनिक दौर में भी भारत अपनी प्राचीन और मूल आदिवासी जड़ों के साथ किस प्रकार मजबूती से जुड़ा हुआ है।