छत्तीसगढ़ में आरएसएस की बड़ी तैयारी, दो हिस्सों में बंट सकती है प्रांतीय इकाई
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का छत्तीसगढ़ दौरा राज्य की राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बन गया है। दो दिवसीय महत्वपूर्ण प्रवास पर बिलासपुर पहुंचे संघ प्रमुख के इस दौरे को केवल एक सामान्य संगठनात्मक समीक्षा बैठक नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसके पीछे संघ के ढांचे में होने वाले एक ऐतिहासिक और दूरगामी बदलाव की रूपरेखा तैयार की जा रही है। सूत्रों से मिल रही पुख्ता जानकारियों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में संघ की प्रांतीय इकाई को दो हिस्सों में विभाजित करने पर गंभीर मंथन चल रहा है। भौगोलिक विस्तार, प्रशासनिक सुगमता और दूरदराज के आदिवासी अंचलों तक संघ की पकड़ को और अधिक मजबूत करने के लिए यह निर्णय लिया जा सकता है। आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च, गूगल डिस्कवर की गाइडलाइंस और एईओ (AEO) मानकों को ध्यान में रखते हुए इस पूरी खबर का विस्तृत विश्लेषण यहां प्रस्तुत है।
छत्तीसगढ़ में संघ के ढांचे का विकेंद्रीकरण और दो हिस्सों में बटने की तैयारी
छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पूरी सांगठनिक गतिविधियों का संचालन एक एकीकृत प्रांतीय इकाई के रूप में किया जाता रहा है। पूरे प्रदेश की कमान एक ही प्रांत प्रमुख और प्रांतीय टोली के हाथों में होती है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में राज्य के भौगोलिक विस्तार और जिलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह महसूस किया जाने लगा था कि सिंगल यूनिट के जरिए हर कोने पर सूक्ष्म निगरानी रख पाना चुनौतीपूर्ण हो रहा है। इसी जमीनी वास्तविकता और भौगोलिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अब छत्तीसगढ़ प्रांत को दो अलग-अलग सांगठनिक हिस्सों में बांटे जाने का प्रस्ताव अंतिम चरण में पहुंच गया है। इस संभावित विभाजन के तहत एक हिस्से में बिलासपुर और सरगुजा संभाग को शामिल किए जाने की योजना है, जबकि दूसरे हिस्से में रायपुर, दुर्ग और बस्तर संभाग के क्षेत्र आ सकते हैं। इस तरह के बड़े प्रशासनिक और सांगठनिक फेरबदल से संघ के कार्यों में न सिर्फ गति आएगी, बल्कि हर संभाग की स्थानीय समस्याओं और जरूरतों के हिसाब से रणनीतियां भी तेजी से बनाई जा सकेंगी।
बिलासपुर दौरे पर पहुंचे मोहन भागवत, बैठकों और मंथन का दौर शुरू
आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत अपने निर्धारित दो दिवसीय प्रवास के तहत बिलासपुर पहुंच चुके हैं। बिलासपुर के कोनी स्थित सरस्वती शिशु मंदिर परिसर में उनके ठहरने और बैठकों का दौर आयोजित किया गया है। संघ प्रमुख के इस दौरे का मुख्य उद्देश्य शताब्दी वर्ष के तहत तय किए गए कार्यक्रमों की समीक्षा करना और संगठन के आगामी विस्तार का खाका खींचना है। दौरे के पहले दिन उन्होंने एक विशेष बौद्धिक वर्ग को संबोधित किया, जिसमें संघ के चुनिंदा कार्यकर्ताओं के अलावा विभिन्न वैचारिक पृष्ठभूमि के लोग और पदाधिकारी शामिल हुए। इस बौद्धिक सत्र के दौरान देश के वर्तमान सामाजिक परिवेश, युवाओं की भूमिका और भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई। संघ प्रमुख के इस प्रवास के दौरान सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किए गए हैं और स्थानीय प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद नजर आ रहा है।
प्रांत प्रमुख के पद में बदलाव और नए नेतृत्व को मिलने वाली कमान
संगठन के जानकारों का मानना है कि यदि छत्तीसगढ़ प्रांत को दो हिस्सों में विभाजित किया जाता है, तो सांगठनिक पद और व्यवस्थाओं में भी बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। वर्तमान में जो प्रांतीय इकाई और प्रांत प्रमुख का स्वरूप है, उसमें संशोधन किया जा सकता है। दो अलग-अलग प्रांत बनाए जाने की स्थिति में दो अलग प्रांत प्रचारक और नई प्रांतीय टोलियों का गठन किया जाएगा। इससे न केवल शीर्ष नेतृत्व का बोझ कम होगा बल्कि स्थानीय स्तर के कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने और नेतृत्व संभालने के अधिक अवसर मिलेंगे। इस पूरी प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य रायपुर जैसे महानगरों से हटकर क्षेत्रीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज करना है। मोहन भागवत अपने इस प्रवास के दौरान प्रांतीय कार्यकारिणी और विभाग स्तर के प्रमुखों के साथ अलग-अलग दौर की बैठकों में इस प्रस्ताव के नफा-नुकसान और इसे जमीनी स्तर पर लागू करने की रूपरेखा पर सीधी चर्चा कर रहे हैं।
बस्तर और सरगुजा जैसे दूरस्थ अंचलों में शाखाओं के विस्तार पर विशेष जोर
छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों की तुलना में बस्तर और सरगुजा जैसे वनांचल तथा आदिवासी बहुल क्षेत्रों में संघ की शाखाओं का घनत्व अपेक्षाकृत कम रहा है। भौगोलिक दूरियां और कठिन परिस्थितियां इसके प्रमुख कारण रहे हैं। संघ नेतृत्व लंबे समय से यह महसूस कर रहा है कि इन दूरस्थ अंचलों में आदिवासियों के बीच अपनी पैठ को और अधिक गहरा किया जाए। प्रांतीय इकाई के विभाजन के पीछे बस्तर और सरगुजा संभाग पर विशेष फोकस करना भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। जब इन क्षेत्रों के लिए एक स्वतंत्र सांगठनिक इकाई या प्रशासनिक केंद्र होगा, तो वहां नियमित रूप से शाखाओं के संचालन, सामाजिक समरसता के कार्यों और जन-कल्याणकारी अभियानों को तीव्र गति दी जा सकेगी। संघ का यह प्रयास जनजातीय समाज के बीच अपनी वैचारिक उपस्थिति को और अधिक सुदृढ़ करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।
Gen-Z और युवा पीढ़ी को जोड़ने के लिए बनाई जा रही है नई रणनीति
बदलते दौर और आधुनिक युग की तासीर को देखते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब युवाओं, विशेषकर Gen-Z पीढ़ी को अपने साथ जोड़ने के लिए विशेष रणनीतिक बदलाव कर रहा है। देश और दुनिया में हालिया युवाओं के आंदोलनों और सामाजिक बदलावों को ध्यान में रखते हुए संघ ने अब 40 वर्ष से कम उम्र के युवाओं को संगठन की मुख्यधारा से जोड़ने का लक्ष्य तय किया है। मोहन भागवत के छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान इस विषय पर भी विस्तृत मंथन किया जा रहा है कि किस प्रकार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) जैसे आनुषंगिक संगठनों के समन्वय से युवाओं को अधिक से अधिक संख्या में जोड़ा जाए। युवाओं को केवल पारंपरिक शाखाओं तक सीमित न रखकर उन्हें समसामयिक मुद्दों, राष्ट्र निर्माण के अभियानों और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के जरिए जोड़ने के तौर-तरीकों पर विचार किया जा रहा है।
शताब्दी वर्ष के कार्यों की समीक्षा और आगामी कार्ययोजना का निर्धारण
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वर्तमान में अपने स्थापना के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों को लेकर देशव्यापी अभियानों में जुटा हुआ है। छत्तीसगढ़ में भी घर-घर संपर्क अभियान, भारत माता के चित्रों का वितरण और संघ के परिचय से जुड़ी पत्रक सामग्री को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य बड़े पैमाने पर किया गया है। बिलासपुर में आयोजित बैठकों के दौरान इन तमाम अभियानों की अद्यतन प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की जा रही है। प्रांत, विभाग और विभिन्न योजना प्रमुख अपनी-अपनी रिपोर्ट संघ प्रमुख के समक्ष रख रहे हैं। इन रिपोर्ट्स की समीक्षा के बाद आगामी महीनों के लिए छत्तीसगढ़ में संघ के कार्यक्रमों की नई रूपरेखा तय की जाएगी। संघ प्रमुख का यह दौरा आने वाले समय में छत्तीसगढ़ की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में बड़े बदलावों का संकेत दे रहा है, जिसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं।