Chhattisgarh : सुकमा से आंध्र तक हड़कंप पुलिस के लिए बड़ी जीत, जिस जोड़े की तलाश थी सालों से, वो खुद चला आया
News India Live, Digital Desk: छत्तीसगढ़ के सुकमा और बस्तर के जंगलों की चर्चा अक्सर गोलियों की तड़तड़ाहट के लिए होती है। लेकिन आज वहां से एक ऐसी खबर आई है, जो हिंसा के बीच शांति की एक उम्मीद जगाती है। दशकों तक "लाल आतंक" यानी नक्सलवाद के रास्ते पर चलने वाले एक शीर्ष नक्सली जोड़े ने आखिरकार यह मान लिया है कि हिंसा से कुछ हासिल नहीं होने वाला।
खबर है कि सुकमा इलाके में दहशत का दूसरा नाम माने जाने वाले इस जोड़े ने पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया है। यह सिर्फ़ पुलिस की जीत नहीं है, बल्कि उस विचारधारा की हार है जो लोगों को मुख्यधारा से तोड़ने का काम करती है।
बंदूक का बोझ अब नहीं उठता
इस नक्सली दंपत्ति के सिर पर लाखों रुपये का इनाम था। सालों तक ये जंगलों में छिपे रहे, कई बड़ी वारदातों में इनका नाम आया। लेकिन सवाल यह है कि अचानक इनका दिल क्यों बदला?
सरेंडर करने के बाद अक्सर जो बातें सामने आती हैं, वो बेहद मानवीय होती हैं। जंगल की बेहद कठिन ज़िंदगी, संगठन के अंदर होता भेदभाव और सबसे बड़ी बात"खोखली विचारधारा"। उन्हें यह एहसास हो गया कि जिस 'क्रांति' के नाम पर उनसे हथियार उठवाए गए थे, असल में वो सिर्फ़ तबाही का रास्ता है। अब वे भी एक आम इंसान की तरह अपने परिवार के साथ चैन की नींद सोना चाहते हैं।
पुलिस और प्रशासन की बड़ी कामयाबी
यह सरेंडर इसलिए भी ख़ास है क्योंकि सुकमा के नक्सली अक्सर बेहद कट्टर माने जाते हैं। उनका हथियार डालना इस बात का सबूत है कि सरकार की 'पुनर्वास नीति' अब रंग ला रही है। पुलिस भी अब सिर्फ़ गोली का जवाब गोली से नहीं दे रही, बल्कि भटके हुए लोगों को वापस लौटने का मौका दे रही है।
आंध्र प्रदेश पुलिस के लिए यह एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि जब संगठन के बड़े कमांडर या इनामी लोग सरेंडर करते हैं, तो नीचे के कैडर का मनोबल टूटता है।
एक नई शुरुआत
अब यह जोड़ा मुख्यधारा में लौट आया है। उम्मीद है कि सरकार की योजनाओं का लाभ लेकर ये एक सम्मानजनक ज़िंदगी जियेंगे। यह घटना उन बाकी साथियों के लिए भी एक सन्देश है जो आज भी जंगल में भटक रहे हैं कि बंदूक छोड़कर समाज में लौटना कभी भी संभव है।