Chhattisgarh Paddy Procurement : खेत में पसीना बहाना आसान है, लेकिन मंडी में अपनी फसल बेचना शायद सबसे मुश्किल काम!

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News India Live, Digital Desk: छत्तीसगढ़ को हम 'धान का कटोरा' कहते हैं, लेकिन अगर उसी कटोरे को भरने वाले किसान की आँखों में आंसू हों, तो सिस्टम पर सवाल उठना लाजिमी है। हाल ही में एक ऐसी खबर आई है जिसने एक बार फिर हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारे देश के अन्नदाता की जान इतनी सस्ती क्यों है?

मामला धान खरीदी केंद्र (मंडी) का है, जहां खुशियाँ बिकनी चाहिए थीं, लेकिन वहां मायूसी छाई है। एक किसान, जो महीनों की मेहनत के बाद अपनी फसल तैयार करके मंडी लाया था, उसे सिर्फ एक 'टोकन' के लिए अपनी जान देने की कोशिश करनी पड़ी।

सिर्फ एक 'टोकन' का दर्द

जरा सोचिए उस किसान की मानसिक हालत के बारे में। वो सुबह जल्दी उठकर तैयार होता है, उम्मीद लेकर समिति या खरीदी केंद्र पहुँचता है कि आज उसका धान बिक जाएगा और घर में दो पैसे आएंगे। लेकिन वहां उसे मिलता क्या है? इंतज़ार, लंबी लाइन और कभी सर्वर ठप होने का बहाना तो कभी अधिकारियों की टालमटोल।

बताया जा रहा है कि यह किसान टोकन (धान बेचने की तारीख वाली पर्ची) पाने के लिए कई दिनों से चक्कर काट रहा था। जब उसकी सुनवाई नहीं हुई और उसे खाली हाथ लौटा दिया गया, तो हताशा इस कदर बढ़ गई कि उसने वहीं केंद्र पर जहर खाकर जान देने की कोशिश की।

अधिकारी जागे, लेकिन कब?

हमारे यहाँ रिवाज सा बन गया है। जब तक कोई बड़ी अनहोनी न हो जाए, कुर्सियाँ नहीं हिलतीं। जैसे ही किसान ने जहर खाया, वैसे ही हड़कंप मच गया। अब जाँच की बात हो रही है, अस्पताल में इलाज चल रहा है, लेकिन सवाल वही खड़ा है—क्या किसान को अपनी बात मनवाने के लिए अपनी जान दांव पर लगानी पड़ेगी?

यह सिर्फ एक किसान की कहानी नहीं है। मंडियों में अव्यवस्था, बारदाने की कमी और टोकन के लिए मची मारामारी आम बात हो गई है। किसान बस इतना चाहता है कि उसकी फसल सही समय पर और सही दाम में बिक जाए।

हमें सोचने की ज़रूरत है

एक तरफ हम डिजिटल भारत की बात करते हैं, दूसरी तरफ एक किसान कंप्यूटर से निकली पर्ची के लिए जद्दोजहद कर रहा है। यह घटना सिर्फ प्रशासन की लापरवाही नहीं, बल्कि हमारी संवेदनहीनता को भी दिखाती है। दुआ कीजिये कि वो किसान ठीक हो जाए, लेकिन साथ ही उम्मीद कीजिये कि सिस्टम भी 'ठीक' हो जाए ताकि फिर किसी अन्नदाता को यह कदम न उठाना पड़े।