मौसम का बदलता मिजाज या आपके दिमाग का? जानिए कैसे बढ़ती गर्मी बढ़ा रही है आपकी टेंशन

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News India Live, Digital Desk : क्या आपने कभी नोटिस किया है कि पिछले कुछ सालों में लोगों के अंदर गुस्सा और चिड़चिड़ापन कितना बढ़ गया है? हम अक्सर इसका ज़िम्मेदार अपनी भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल, ऑफिस के प्रेशर या महंगाई को मानते हैं। लेकिन ज़रा रुकिए नई रिसर्च कुछ और ही इशारा कर रही है।

हो सकता है कि आपकी इस बेचैनी, उदासी और बेवजह के डर की वजह Climate Change (जलवायु परिवर्तन) हो। जी हाँ, बदलता हुआ मौसम सिर्फ पहाड़ों की बर्फ नहीं पिघला रहा, बल्कि हमारे दिमाग के रसायनों (Chemicals) को भी पिघला रहा है।

आइये, इस गंभीर मुद्दे को बहुत आसान भाषा में समझते हैं, क्योंकि यह हम सब की कहानी है।

क्या है 'इको-एंग्जायटी' (What is Eco-Anxiety)?

जब आप खबरों में देखते हैं कि कहीं जंगल जल रहे हैं, कहीं बाढ़ आ रही है, या आपके अपने शहर में सांस लेना मुश्किल हो गया है, तो क्या आपको एक अजीब सी घबराहट (Panic) महसूस होती है? क्या आपको लगता है कि "हमारे बच्चों का क्या होगा?"

मनोविज्ञान में इसे ही 'Eco-Anxiety' या जलवायु चिंता कहा जाता है। यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि आप एक संवेदनशील इंसान हैं जो अपनी धरती की बिगड़ती हालत को महसूस कर पा रहा है। लेकिन अब यह चिंता डिप्रेशन का रूप लेने लगी है।

गर्मी और गुस्से का सीधा कनेक्शन

नई शोध (Research) बताती है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, इंसान का दिमाग काम करना कम कर देता है और 'एग्रेसन' (Aggression) बढ़ने लगता है। आपने खुद महसूस किया होगा कि भयंकर गर्मी वाले दिनों में हम बात-बात पर खीझ जाते हैं। ट्रैफिक में लोग ज्यादा लड़ते हैं। यह महज़ संयोग नहीं है। अत्यधिक गर्मी हमारे शरीर में 'स्ट्रेस हॉर्मोन' (Cortisol) का लेवल बढ़ा देती है, जिससे हम रिलैक्स नहीं रह पाते।

बेबसी का अहसास (Feeling Helpless)

क्लाइमेट चेंज का सबसे बुरा असर यह है कि यह इंसान को लाचार महसूस करवाता है। जब हम देखते हैं कि बेमौसम बारिश ने किसान की फसल बर्बाद कर दी या वायु प्रदूषण से लोग बीमार पड़ रहे हैं, तो हमें लगता है कि "हम कुछ नहीं कर सकते।" यह बेबसी (Helplessness) धीरे-धीरे हमारे मानसिक सुकून को दीमक की तरह खा जाती है। इसे 'सोलास्टेल्जिया' (Solastalgia) भी कहते हैं—यानी अपने ही घर में बेगानापन महसूस करना क्योंकि आपका वातावरण बदल चुका है।

नींद पर असर

रातों को ज़्यादा तापमान होने की वजह से गहरी नींद (Deep Sleep) नहीं आ पाती। और जब नींद पूरी नहीं होती, तो अगले दिन मेंटल हेल्थ का बिगड़ना तय है। यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें हम फंसते जा रहे हैं।

तो अब क्या करें?

घबराना इसका हल नहीं है। सबसे पहले यह स्वीकार करें कि यह एक वास्तविक समस्या है।

  1. नेचर से जुड़ें: जब भी वक़्त मिले, पेड़ों के पास जाएँ। रिसर्च कहती है कि सिर्फ़ 20 मिनट हरियाली में बिताने से दिमाग शांत होता है।
  2. खबरों का डिटॉक्स: 24 घंटे आपदाओं की ख़बरें न देखें।
  3. छोटे कदम: बड़ी समस्याओं को हम अकेले नहीं सुलझा सकते, लेकिन छोटे कदम (जैसे पानी बचाना, कचरा कम करना) हमें मानसिक संतुष्टि (Satisfaction) देते हैं कि हम 'समाधान' का हिस्सा हैं, न कि समस्या का।

याद रखिये, मौसम हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन हमारा 'मन' हमारे हाथ में है। इसे बिगड़ते पर्यावरण का शिकार न होने दें। जागरूक बनें और बात करें, क्योंकि यह सिर्फ़ आपकी नहीं, हम सबकी लड़ाई है।