CIBIL स्कोर 750+ फिर भी बैंक ने रिजेक्ट कर दिया लोन? जानिए वे 5 अनदेखी वजहें जो बिगाड़ती हैं आपका खेल
अक्सर लोग यह मान बैठते हैं कि अगर उनका क्रेडिट ब्यूरो स्कोर 750 या 800 के पार पहुंच गया, तो बैंक बिना किसी सवाल-जवाब के तुरंत लोन मंजूर कर देगा। क्रेडिट स्कोर लोन आवेदन का पहला दरवाजा जरूर खोलता है, लेकिन यह लोन मिलने की 100% गारंटी कभी नहीं होता। जब आप किसी बैंक या एनबीएफसी (NBFC) में पर्सनल लोन, होम लोन या कार लोन के लिए आवेदन करते हैं, तो बैंक केवल आपकी पिछली रीपेमेंट हिस्ट्री नहीं देखता, बल्कि आपकी मौजूदा वित्तीय स्थिति, भविष्य में कर्ज चुकाने की क्षमता और रिस्क प्रोफाइल का भी गहरा मूल्यांकन करता है। बैंकिंग नियमों के तहत अंडरराइटिंग टीम क्रेडिट रिपोर्ट के साथ-साथ कई ऐसे इंटरनल पैमानों की जांच करती है, जहां छोटी सी चूक भी आपके मजबूत स्कोर पर भारी पड़ जाती है और आवेदन निरस्त हो जाता है।
1. FOIR यानी आमदनी के मुकाबले मौजूदा कर्जों का भारी बोझ
बैंकों द्वारा लोन नामंजूर करने का सबसे बड़ा और आम कारण फिक्स्ड ऑब्लिगेशन टू इनकम रेशियो (FOIR) का असंतुलन है। इसका सीधा मतलब यह है कि आपकी कुल मासिक इन-हैंड सैलरी में से कितना हिस्सा पहले से चल रही ईएमआई और क्रेडिट कार्ड बिलों में जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक और प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों के आंतरिक दिशानिर्देशों के अनुसार, एक सुरक्षित FOIR आमतौर पर 40% से 50% के बीच माना जाता है। मान लीजिए आपकी कुल मासिक टेक-होम सैलरी ₹60,000 है और आप पहले से ही विभिन्न पुराने लोन्स के लिए ₹32,000 प्रति माह ईएमआई चुका रहे हैं, तो आपका FOIR 53% से ऊपर निकल चुका है। भले ही आपने इन सभी ₹32,000 की किस्तों का भुगतान समय पर करके 770 का स्कोर बना रखा हो, बैंक नया लोन देने से मना कर देगा क्योंकि उसके जोखिम मॉडल के अनुसार आपके पास नई ईएमआई चुकाने के लिए पर्याप्त डिस्पोजेबल कैश नहीं बचता।
2. कम समय में ताबड़तोड़ लोन आवेदन और हार्ड इन्क्वायरी का जाल
जब किसी व्यक्ति को अचानक पैसों की जरूरत होती है, तो वह एक साथ तीन-चार बैंकों, ऑनलाइन लेंडिंग ऐप्स और क्रेडिट कार्ड पोर्टल्स पर आवेदन कर देता है। हर बार जब आप औपचारिक रूप से लोन के लिए फॉर्म जमा करते हैं, तो संबंधित लेंडर सिबिल (TransUnion CIBIL), एक्सपेरियन या सीआरआईएफ हाई मार्क से आपकी रिपोर्ट मांगता है, जिसे बैंकिंग भाषा में 'हार्ड इन्क्वायरी' कहा जाता है। यदि क्रेडिट ब्यूरो की रिपोर्ट में पिछले 30 से 60 दिनों के भीतर बैक-टू-बैक 4 या 5 हार्ड इन्क्वायरी दर्ज हो जाती हैं, तो बैंक का ऑटोमेटेड रिस्क सिस्टम आपको 'क्रेडिट हंग्री' यानी कर्ज के लिए बेचैन घोषित कर देता है। लेंडर्स को लगता है कि आपकी वित्तीय स्थिति गंभीर संकट में है और आप कर्ज के सहारे दिन काट रहे हैं, जिससे स्कोर ऊंचा होने के बावजूद प्रोफाइल हाई-रिस्क श्रेणी में चली जाती है।
3. पोर्टफोलियो में सिक्योर्ड बनाम अनसिक्योर्ड लोन का बिगड़ा अनुपात
क्रेडिट स्कोर की गुणवत्ता इस बात पर भी निर्भर करती है कि आपने किस प्रकार के लोन लिए हैं। क्रेडिट पोर्टफोलियो दो प्रकार के होते हैं—सिक्योर्ड (होम लोन, गोल्ड लोन, ऑटो लोन) और अनसिक्योर्ड (पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड, कंज्यूमर ड्यूरेबल ईएमआई, बाय नाउ पे लेटर)। यदि किसी व्यक्ति की क्रेडिट हिस्ट्री में कोई परिसंपत्ति आधारित (सिक्योर्ड) कर्ज नहीं है, बल्कि उसके नाम पर 4 पर्सनल लोन और 3 क्रेडिट कार्ड चल रहे हैं, तो यह क्रेडिट मिक्स बेहद कमजोर माना जाता है। बैंक ऐसे उधारकर्ताओं को प्राथमिकता देते हैं जिनके पास सिक्योर्ड और अनसिक्योर्ड कर्जों का संतुलित मिश्रण हो। सिर्फ अनसिक्योर्ड लोन की भरमार देखकर बैंक का क्रेडिट मैनेजर यह मान लेता है कि ग्राहक लगातार असुरक्षित उधारी पर निर्भर है, जिससे डिफॉल्ट का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
4. रोजगार की अस्थिरता और कंपनी की श्रेणी का कमजोर होना
आपकी रीपेमेंट हिस्ट्री भले ही बेदाग हो, लेकिन अगर आपकी मौजूदा नौकरी या आय का जरिया अस्थिर है, तो बैंक सतर्क हो जाते हैं। लोन अप्रूवल प्रक्रिया में लेंडर यह अनिवार्य रूप से देखता है कि आप वर्तमान कंपनी में कितने समय से कार्यरत हैं और आपका कुल वर्क एक्सपीरियंस कितना है। यदि किसी व्यक्ति ने पिछले 2 वर्षों में 4 बार नौकरियां बदली हैं या उसका प्रोबेशन पीरियड चल रहा है, तो बैंक आय की निरंतरता पर सवाल उठाते हैं। इसके अलावा हर प्रमुख बैंक (जैसे SBI, HDFC, ICICI) के पास नियोक्ताओं की श्रेणीबद्ध सूची (Cat A, Cat B, Cat C) होती है। यदि आपकी कंपनी किसी असंगठित क्षेत्र, अत्यधिक घाटे में चल रहे स्टार्टअप या अप्रूव्ड लिस्ट से बाहर की श्रेणी में आती है, तो बैंक अधिक आय होने के बावजूद सख्त एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया के चलते फाइल खारिज कर सकते हैं।
5. को-साइनर, गारंटर बनना या क्रेडिट रिपोर्ट में 'Settled' का पुराना दाग
कई बार लोग अपने दोस्तों या रिश्तेदारों की मदद के लिए उनके लोन में गारंटर या को-ऐप्लिकेंट बन जाते हैं। यदि उस मुख्य उधारकर्ता ने कोई किस्त बाउंस की या लोन चुकाने में असमर्थ रहा, तो उसका सीधा नकारात्मक असर आपके नाम पर भी दर्ज हो जाता है। इसके अलावा एक और गंभीर स्थिति होती है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है—क्रेडिट कार्ड या पुराने छोटे लोन का 'सेटेलमेंट'। यदि आपने कुछ साल पहले किसी बैंक से विवाद सुलझाने के लिए पूरा पैसा चुकाने के बजाय 'वन-टाइम सेटलमेंट' किया था, तो खाते की स्थिति 'Closed' के बजाय 'Settled' या 'Written Off' दिखाई देती है। समय के साथ नियमित बिल चुकाने से आपका स्कोर वापस 750 तक तो पहुंच सकता है, लेकिन रिपोर्ट की डीप स्क्रूटनी के दौरान यह स्टेटस दिखते ही अंडरराइटर सीधे लोन रिजेक्ट कर देते हैं, क्योंकि सेटलमेंट का मतलब बैंक के पैसे का नुकसान होता है।