FD मैच्योर हो गई लेकिन पैसा नहीं निकाला तो क्या होगा? जानिए RBI का नया नियम और ब्याज का पूरा गणित
फिक्स्ड डिपॉजिट (Fixed Deposit) में निवेश करने वाले कई ग्राहक अक्सर अपनी एफडी की मैच्योरिटी डेट (परिपक्वता तिथि) को भूल जाते हैं या समय पर बैंक जाकर अथवा नेट बैंकिंग के जरिए पैसे को क्लेम नहीं करते। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि बैंक में पड़े उस पैसे का क्या होता है और क्या उस पर पहले की तरह ही फिक्स्ड डिपॉजिट का ऊंचा ब्याज मिलता रहता है?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अनक्लेम्ड या ओवरड्यू फिक्स्ड डिपॉजिट को लेकर सख्त और स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए हैं। यदि आपकी एफडी पूरी हो चुकी है और आपने निकासी या रिन्यूअल के लिए कोई पूर्व-निर्देश (Instructions) नहीं दिए हैं, तो उस पर सामान्य एफडी का ब्याज मिलना तुरंत बंद हो जाता है।
RBI की ओवरड्यू डिपॉजिट गाइडलाइन: किस दर से मिलेगा ब्याज?
रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार, यदि कोई टर्म डिपॉजिट मैच्योर हो जाती है और राशि लावारिस/अनपेड रह जाती है, तो उस पर मिलने वाला ब्याज निम्नलिखित दो दरों में से जो भी कम (Lower) होगी, उसके आधार पर तय किया जाता है:
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संबंधित बैंक की चालू बचत खाता ब्याज दर (Savings Bank Interest Rate)।
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मूल एफडी पर मिलने वाली अनुबंधित ब्याज दर (Contracted FD Interest Rate)।
चूंकि बचत खाते की ब्याज दर (जो आमतौर पर 2.70% से 3.50% के बीच होती है) हमेशा लंबी अवधि की एफडी दर (6.50% से 7.50%) से काफी कम होती है, इसलिए मैच्योरिटी के अगले ही दिन से आपकी पूरी जमा पूंजी पर केवल बचत खाते की दर से ब्याज जुड़ना शुरू होता है। इससे निवेशक को ब्याज का भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
ऑटो-रिन्यूअल (Auto-Renewal) की सुविधा: कब खुद रिन्यू हो जाती है FD?
एफडी खोलते समय अधिकांश बैंक ग्राहकों से 'Maturity Instructions' मांगते हैं। यदि आपने खाता खोलते वक्त 'Auto-Renewal' का विकल्प चुना था, तो आपको बैंक जाने की आवश्यकता नहीं होती:
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समान अवधि के लिए रिन्यूअल: बैंक आपकी मैच्योरिटी राशि (मूलधन + अर्जित ब्याज) को उसी अवधि के लिए दोबारा नई एफडी में तब्दील कर देता है।
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लागू ब्याज दर: ध्यान रहे कि रिन्यूअल के समय वही ब्याज दर लागू होगी जो उस विशेष दिन बैंक में चल रही होगी, न कि वह पुरानी दर जिस पर आपने वर्षों पहले निवेश किया था।
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समय से पहले तोड़ने पर पेनाल्टी: यदि ऑटो-रिन्यू होने के कुछ दिनों बाद आप अचानक पैसा निकालते हैं, तो बैंक इसे 'प्री-मैच्योर विड्रॉल' मानकर 0.5% से 1% तक की पेनाल्टी काट सकता है।
10 साल तक पैसा न निकालने पर क्या होता है? (DEA Fund में ट्रांसफर)
यदि कोई ग्राहक अपनी मैच्योर हो चुकी एफडी का पैसा 10 वर्षों तक क्लेम नहीं करता और खाते में कोई लेन-देन नहीं होता, तो बैंक के नियम और कड़े हो जाते हैं:
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अनक्लेम्ड डिपॉजिट क्लासिफिकेशन: 10 साल तक निष्क्रिय रहने वाली राशि को आधिकारिक तौर पर 'लावारिस जमा' (Unclaimed Deposit) घोषित कर दिया जाता है।
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आरबीआई के DEA फंड में अंतरण: बैंक इस पूरी राशि को भारतीय रिजर्व बैंक के 'जमाकर्ता शिक्षा और जागरूकता' (Depositor Education and Awareness - DEA) फंड में ट्रांसफर कर देते हैं।
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पैसा वापस पाने का तरीका: हालांकि यह पैसा डूबता नहीं है। मूल जमाकर्ता या उसका कानूनी वारिस/नॉमिनी आवश्यक पहचान पत्र और मूल एफडी रसीद प्रस्तुत करके बैंक से अपनी रकम पर दावा (Claim) कर सकता है। आरबीआई का केंद्रीकृत पोर्टल 'उद्गम' (UDGAM Portal) ऐसे ही अनक्लेम्ड पैसों को खोजने की सुविधा देता है।
नुकसान से बचने के लिए क्या करें निवेशक?
एफडी के पैसे पर ब्याज नुकसान से बचने के लिए निवेशकों को कुछ बुनियादी सावधानियां बरतनी चाहिए:
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ऑटो-क्रेडिट मैंडेट सेट करें: एफडी बनाते समय हमेशा निर्देश दें कि मैच्योरिटी के दिन पूरी रकम अपने आप आपके सेविंग्स अकाउंट में ट्रांसफर हो जाए।
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कैलेंडर या फोन में रिमाइंडर लगाएं: एफडी की परिपक्वता तिथि से एक सप्ताह पहले का अलर्ट सेट करें ताकि समय रहते पैसे को पुनर्निवेश (Reinvest) करने का फैसला लिया जा सके।
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नॉमिनी और मोबाइल नंबर अपडेट रखें: सुनिश्चित करें कि आपके बैंक खाते में सही मोबाइल नंबर और नॉमिनी का नाम दर्ज है, जिससे मैच्योरिटी के एसएमएस अलर्ट समय पर मिलते रहें।