मोहताज नहीं रहेगा इलाज: शादी के बाद भी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे आश्रित बेटों और भाइयों को जीवनभर मिलेगा CGHS का लाभ, सरकार का बड़ा फैसला
केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों, पेंशनभोगियों और उनके परिवारों के कल्याण की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बेहद संवेदनशील, मानवीय और ऐतिहासिक फैसला लिया है, जो लाखों परिवारों के लिए एक बहुत बड़ी राहत बनकर सामने आया है। देश के स्वास्थ्य मंत्रालय ने उन परिवारों के लिए 'सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम' (CGHS) और सेंट्रल सर्विसेज (मेडिकल अटेंडेंस) रूल्स, 1944 के नियमों में बड़ा और सकारात्मक संशोधन किया है, जिनके घरों में कोई आश्रित बेटा या भाई किसी गंभीर, क्रॉनिक या टर्मिनल बीमारी से जूझ रहा है। अब तक के पुराने नियमों के अनुसार एक तय उम्र सीमा या शादी होने के बाद आश्रितों की चिकित्सा सुविधा समाप्त हो जाती थी, जिससे गंभीर रोगियों के इलाज का भारी आर्थिक बोझ परिवारों पर आ जाता था। लेकिन सरकार के इस नए और क्रांतिकारी नियम के तहत अब गंभीर और जानलेवा बीमारियों से ग्रस्त पात्र आश्रित बेटों और भाइयों को जीवनभर के लिए मुफ्त या रियायती चिकित्सा कवर (Medical Cover) प्राप्त होता रहेगा। सरकार के इस कदम से उन परिवारों को बहुत बड़ा संबल मिला है जो लंबे समय से अपने किसी बीमार सदस्य के महंगे इलाज और जीवनरक्षक दवाओं के खर्च को लेकर लगातार चिंतित रहते थे।
उम्र और वैवाहिक बंधन से मुक्ति: शादी के बाद भी जारी रहेगा इलाज का अधिकार
पूर्व में लागू नियमों के प्रावधानों के मुताबिक, सामान्य परिस्थितियों में कोई भी आश्रित बेटा 25 वर्ष की उम्र तक ही सीजीएचएस (CGHS) सुविधा का पात्र माना जाता था, और केवल स्थायी रूप से दिव्यांग अविवाहित बेटों को ही जीवनभर यह सुविधा मिलने का प्रावधान था। इसी प्रकार, आश्रित भाई के लिए सामान्य आयु सीमा मात्र 18 वर्ष निर्धारित थी, जबकि दिव्यांग भाइयों को उम्र की सीमा से छूट मिली हुई थी। लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा लाए गए इन नए संशोधनों के बाद, गंभीर या टर्मिनल बीमारियों से पीड़ित पात्र आश्रित बेटों और भाइयों के लिए उम्र और वैवाहिक स्थिति से जुड़ी तमाम पुरानी शर्तें बेमानी हो गई हैं। सबसे बड़ी और राहत भरी बात यह है कि अब यदि किसी पात्र आश्रित बेटे या भाई की शादी भी हो जाती है, तो भी केवल विवाह हो जाने के आधार पर उसकी सीजीएचएस चिकित्सा सुविधा को बंद नहीं किया जाएगा। हालांकि, सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि वैवाहिक स्थिति में यह विशेष छूट केवल उस मुख्य आश्रित (बेटे या भाई) तक ही पूरी तरह से सीमित रहेगी, और इसके आधार पर उसके पति, पत्नी या बच्चों को इस योजना का स्वतः लाभ नहीं मिलेगा, यानी इससे सीजीएचएस के दायरे में 'परिवार' की पारंपरिक परिभाषा का विस्तार नहीं होगा।
किन गंभीर और जानलेवा बीमारियों को किया गया है इस दायरे में शामिल?
सरकार द्वारा उठाए गए इस कल्याणकारी कदम का लाभ हर उस बीमारी के मरीज को नहीं मिलेगा, बल्कि इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने गंभीर, क्रॉनिक और टर्मिनल बीमारियों की एक स्पष्ट श्रेणी निर्धारित की है। इन नए प्रावधानों के तहत मुख्य रूप से उन स्वास्थ्य स्थितियों और बीमारियों को शामिल किया गया है, जिनके कारण व्यक्ति की दैनिक कार्यक्षमता लंबे समय तक या हमेशा के लिए गंभीर रूप से प्रभावित हो जाती है, जिससे उसका खुद के दम पर आजीविका कमाना और आत्मनिर्भर होना पूरी तरह असंभव हो जाता है। इस सूची में कैंसर जैसी गंभीर या जानलेवा बीमारियां, जटिल न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर, लंबे समय तक निरंतर चिकित्सा देखभाल या जीवनरक्षक सपोर्ट की आवश्यकता वाली एंड-स्टेज ऑर्गन डिजीज (अंगों का काम करना बंद करना), गंभीर जन्मजात या जेनेटिक बीमारियां और इसी तरह की अन्य मल्टी-सिस्टम क्रॉनिक बीमारियों को शामिल किया गया है। सरकार का यह स्पष्ट मानना है कि ऐसे गंभीर मामलों में जहां मरीज का जीवन और स्वास्थ्य पूरी तरह से अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है, वहां परिवार का आर्थिक सहारा बनने के बजाय सरकार को उनके इलाज की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए आगे आना चाहिए।
केस-टू-केस आधार पर मेडिकल बोर्ड करेगा पात्रता का मूल्यांकन और फैसला
यह बात ध्यान देने योग्य है कि हर मामले में अपने आप स्वतः ही जीवनभर के लिए सीजीएचएस सुविधा नहीं मिल जाएगी, बल्कि इसके लिए पात्रता का निर्धारण पूरी तरह से 'केस-टू-केस' आधार पर किया जाएगा। इसके तहत यह परखा जाएगा कि संबंधित बीमारी कितनी गंभीर है, उससे मरीज की दैनिकचर्या और कार्यक्षमता पर कितना असर पड़ रहा है, उसकी आत्मनिर्भर होने की क्षमता क्या है और वह वास्तव में अपने परिवार पर किस हद तक निर्भर है। सीजीएचएस लाभार्थियों के इन मामलों की जांच और सिफारिश के लिए क्षेत्रीय स्तर पर विशेष 'मेडिकल बोर्ड्स' (Medical Boards) का गठन किया गया है, जिनकी रिपोर्ट के आधार पर फैसला होगा। यदि किसी लाभार्थी को क्षेत्रीय मेडिकल बोर्ड के फैसले पर कोई आपत्ति या असंतोष है, तो वह सीजीएचएस मुख्यालय के अंतर्गत गठित 'अपीलीय चिकित्सा बोर्ड' (Appellate Medical Board) के समक्ष अपनी अपील या संदर्भ प्रस्तुत कर सकता है। वहीं दूसरी ओर, जो लोग सेंट्रल सर्विसेज (मेडिकल अटेंडेंस) रूल्स, 1944 के दायरे में आते हैं, उनके मामलों में पात्रता का मूल्यांकन और अंतिम सिफारिश स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) द्वारा की जाएगी। स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि समय-समय पर मेडिकल एक्सपर्ट्स की सलाह से इन मानदंडों और बीमारियों की सूचियों की समीक्षा की जाती रहेगी ताकि किसी भी पात्र व्यक्ति को असुविधा न हो।