ग्लोबल उथल-पुथल के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत रफ्तार: वित्त मंत्रालय की आर्थिक मामलों की सचिव ने बताई ग्रोथ की ठोस वजहें

ग्लोबल उथल-पुथल के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत रफ्तार: वित्त मंत्रालय की आर्थिक मामलों की सचिव ने बताई ग्रोथ की ठोस वजहें

मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव, विकसित देशों में ऊंची ब्याज दरों और वैश्विक व्यापार की सुस्त रफ्तार जैसी अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था एक मजबूत और स्थिर 'ब्राइट स्पॉट' के रूप में अपनी स्थिति बनाए हुए है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग (Department of Economic Affairs - DEA) की सचिव ने वैश्विक स्तर पर छाई अनिश्चितताओं के बीच देश की व्यापक आर्थिक स्थिति (मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स) पर विस्तृत समीक्षा साझा करते हुए स्पष्ट किया है कि भारत की अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को सहन करने के लिए पूरी तरह सक्षम और आत्मनिर्भर आधार पर खड़ी है। उन्होंने रेखांकित किया कि मजबूत घरेलू खपत, सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे पर लगातार बढ़ाया गया पूंजीगत व्यय (Capex), सुधरती विनिर्माण गतिविधियां और वित्तीय अनुशासन ही वे प्रमुख स्तंभ हैं जिनके दम पर देश 6.5 से 7 प्रतिशत की टिकाऊ जीडीपी विकास दर की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

वैश्विक रेटिंग एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) द्वारा प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के विकास अनुमानों में कटौती किए जाने के दौर में भी भारत के अनुमानों को स्थिर या सकारात्मक बनाए रखा गया है। वित्त मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों का मानना है कि भारत की विकास गाथा केवल बाहरी निर्यात चक्रों पर निर्भर नहीं है, बल्कि देश का आंतरिक बाजार, डिजिटलीकरण, स्थिर बैंकिंग सेक्टर और वित्तीय नीतियां किसी भी वैश्विक उथल-पुथल से अर्थव्यवस्था को बचाने वाले सुरक्षा कवच के रूप में काम कर रही हैं।

घरेलू मांग और निजी खपत: भारतीय ग्रोथ का सबसे बड़ा इंजन

वित्त मंत्रालय की आर्थिक मामलों की सचिव ने बताया कि वैश्विक मंदी के संकेतों के बावजूद भारत की वास्तविक ताकत उसकी विशाल और लचीली 'घरेलू मांग' (Domestic Consumption) में निहित है। देश के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उपभोक्ता मांग में निरंतर सुधार देखा जा रहा है।

हालिया त्योहारी सीजन में ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रियल एस्टेट और रिटेल क्षेत्र में दर्ज की गई रिकॉर्ड बिक्री इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि घरेलू स्तर पर क्रय शक्ति (Purchasing Power) मजबूत बनी हुई है। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में अनुकूल मानसून के चलते खरीफ फसलों की अच्छी पैदावार और आगामी रबी सत्र की सकारात्मक संभावनाओं ने ग्रामीण आय को मजबूती दी है। जब किसी देश की अर्थव्यवस्था में आंतरिक मांग 60 प्रतिशत से अधिक का योगदान देती हो, तो वैश्विक निर्यात में आने वाली अल्पकालिक गिरावट का कुल विकास दर पर असर काफी सीमित हो जाता है।

सरकारी कैपेक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर बूम ने तैयार की ठोस जमीन

सचिव ने अर्थव्यवस्था को गति देने में केंद्र सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे पर किए जा रहे ऐतिहासिक पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) की केंद्रीय भूमिका पर विशेष जोर दिया। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में सरकार ने कैपेक्स आवंटन को 11 लाख करोड़ रुपये से अधिक के स्तर पर बनाए रखा है, जिसका सीधा असर जमीन पर दिखाई दे रहा है।

रेलवे, नेशनल हाईवेज, एक्सप्रेसवे, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्क और नए हवाई अड्डों के निर्माण में की जा रही यह सरकारी पूंजी निजी क्षेत्र के निवेश (Private Capex) को आकर्षित करने में 'क्राउड-इन' (Crowd-in) इफेक्ट पैदा कर रही है। बुनियादी ढांचे के विकास से सीमेंट, स्टील, इंजीनियरिंग और हैवी मशीनरी जैसे प्रमुख कोर उद्योगों में मांग बनी हुई है, जिससे न केवल आर्थिक उत्पादकता बढ़ रही है बल्कि जमीनी स्तर पर रोजगार के लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अवसर भी सृजित हो रहे हैं।

भारतीय बैंकिंग प्रणाली का मजबूत और स्वस्थ बैलेंस शीट

अर्थव्यवस्था की स्थिरता को आंकने का एक सबसे बड़ा पैमाना देश का बैंकिंग और वित्तीय ढांचा होता है। सचिव ने कहा कि आज भारत की बैंकिंग प्रणाली पिछले कई दशकों के सबसे मजबूत दौर में है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सख्त विनियामक दिशानिर्देशों और बैंकों के विवेकपूर्ण ऋण वितरण के चलते बैंकों का ग्रॉस एनपीए (Gross NPA) घटकर एक दशक के निचले स्तर (लगभग 2.5% से 2.8%) पर आ चुका है।

बैंकों की बैलेंस शीट पूरी तरह साफ-सुथरी है और उनका पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CRAR) अंतरराष्ट्रीय मानकों (बेसल-3) से कहीं अधिक सुरक्षित स्तर पर है। इसके चलते बैंक कॉरपोरेट जगत, एमएसएमई और खुदरा क्षेत्र को बिना किसी वित्तीय तनाव के पर्याप्त क्रेडिट (कर्ज) उपलब्ध करा रहे हैं। एक मजबूत वित्तीय तंत्र वैश्विक तरलता संकट के समय घरेलू उद्योगों को बिना किसी रुकावट के पूंजी का प्रवाह सुनिश्चित करता है।

नियंत्रित राजकोषीय घाटा और विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत बैकअप

वित्त मंत्रालय की सचिव ने भारत के वित्तीय अनुशासन (Fiscal Consolidation) की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि सरकार राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को तय रोडमैप के अनुसार घटाने के लक्ष्य पर पूरी तरह अडिग है। चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.9 प्रतिशत से नीचे लाने और 2026-27 तक इसे 4.5 प्रतिशत से कम करने का लक्ष्य सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) और जीएसटी (GST) संग्रह में लगातार हो रही दोहरे अंकों की वृद्धि ने सरकारी खजाने को अतिरिक्त मजबूती प्रदान की है।

दूसरी ओर, बाह्य क्षेत्र के मोर्चे पर देश का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) 700 अरब डॉलर के ऐतिहासिक उच्च स्तरों के आसपास बना हुआ है। यह विशाल भंडार लगभग 11 से 12 महीनों के आयात खर्च को कवर करने के लिए पर्याप्त है। इतना विशाल विदेशी मुद्रा भंडार रुपये की विनिमय दर में आने वाले अत्यधिक उतार-चढ़ाव को थामने और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के विश्वास को बनाए रखने में केंद्रीय बैंक को प्रभावी ताकत देता है।

भविष्य का परिदृश्य: वैश्विक जोखिमों के बीच सतर्कता और आत्मनिर्भरता

हालांकि आर्थिक संकेतक मजबूत स्थिति बयां कर रहे हैं, लेकिन वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि सरकार वैश्विक जोखिमों के प्रति पूरी तरह सतर्क है। लाल सागर और मध्य-पूर्व में व्यापारिक जहाजों पर तनाव के कारण लॉजिस्टिक्स और शिपिंग फ्रेट की बढ़ती लागत, और कुछ विकसित देशों में भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण के चलते आयातित कच्चे माल की आपूर्ति में आने वाली रुकावटों पर निरंतर निगरानी रखी जा रही है।

सचिव ने निष्कर्ष के रूप में कहा कि भारत ने संरचनात्मक सुधारों (जैसे जीएसटी, पीएलआई स्कीम्स, श्रम सुधार और व्यापक डिजिटलीकरण) के माध्यम से अपनी अर्थव्यवस्था को इतना लचीला बना लिया है कि वह बाहरी तूफानों के बीच भी अपनी विकास यात्रा को अबाध गति से जारी रख सकती है। आने वाले वर्षों में भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए सबसे ठोस और स्थिर धरातल पर खड़ा है।