10 साल का बंधन और 3 महीने का नोटिस: पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए ऐतिहासिक रक्षा समझौते की अंदर की बातें

10 साल का बंधन और 3 महीने का नोटिस: पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए ऐतिहासिक रक्षा समझौते की अंदर की बातें

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और भू-राजनीतिक गलियारों में इन दिनों पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया से एक बहुत ही बड़ा और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। इस्लामिक दुनिया के तीन अहम देश—पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने मिलकर एक ऐतिहासिक संयुक्त रक्षा समझौते (Joint Defense Agreement) पर अपनी मुहर लगा दी है। इस त्रिपक्षीय समझौते को लेकर दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों की नजरें टिकी हुई हैं। हाल ही में सामने आए इस समझौते के 16 अनुच्छेदों वाले पूर्ण मसौदे से कई ऐसे बड़े खुलासे हुए हैं, जो आने वाले समय में वैश्विक राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं। इस समझौते के तहत जहां एक तरफ कम से कम 10 साल तक गठबंधन में जुड़े रहने की अनिवार्य शर्त रखी गई है, वहीं इससे बाहर निकलने के लिए तीन महीने पहले नोटिस देने का नियम बनाया गया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि मक्का में हुए इस ऐतिहासिक रक्षा समझौते की शर्तें क्या हैं और इसके रणनीतिक मायने क्या हैं।

क्या हैं पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के इस नए रक्षा समझौते की मुख्य शर्तें

सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, इस त्रिपक्षीय समझौते को 'मक्का संयुक्त रक्षा समझौता' (Makkah Joint Defense Agreement) का नाम दिया गया है। इस समझौते की सबसे बड़ी और अहम शर्त इसके अनुच्छेद 16 में तय की गई है। इसके मुताबिक, इस रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले तीनों देशों को कम से कम 10 साल तक इस गठबंधन में अनिवार्य रूप से बने रहना होगा।

यदि 10 साल की यह अवधि पूरी होने के बाद इनमें से कोई भी सदस्य देश इस समझौते से अलग होना चाहता है, तो उसे अपनी मंशा जाहिर करते हुए कम से कम तीन महीने पहले लिखित नोटिस देना अनिवार्य होगा। सबसे दिलचस्प बात यह है कि समझौते की यह 10 वर्ष की अवधि किसी कागजी हस्ताक्षर की तारीख से नहीं गिनी जाएगी, बल्कि यह उस दिन से प्रभावी होगी जब गठबंधन के आधिकारिक सचिवालय में अंतिम अनुमोदन दस्तावेज (Ratification Documents) पूरी तरह से जमा हो जाएंगे।

किसी एक देश पर हमला होने पर क्या होगी बाकी देशों की भूमिका

इस नए और कड़े रक्षा समझौते का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील हिस्सा वह है, जो सैन्य सहायता और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। समझौते के अनुच्छेद 2 में यह बहुत ही स्पष्ट रूप से प्रावधान किया गया है कि यदि किसी भी एक सदस्य देश (चाहे वह पाकिस्तान हो, सऊदी अरब हो या तुर्किये) पर बाहर से कोई सशस्त्र हमला होता है, तो बाकी के दोनों देश उसकी रक्षा के लिए तुरंत आगे आएंगे और अपनी पूरी ताकत के साथ सहायता करने के लिए बाध्य होंगे।

हालांकि, समझौते के जानकारों का यह भी कहना है कि इसमें हर हमले पर एक जैसी या आक्रामक सैन्य प्रतिक्रिया देने की अनिवार्यता नहीं रखी गई है। सहायता का स्वरूप, पैमाना और तरीका इस बात पर निर्भर करेगा कि पीड़ित देश की वास्तविक रणनीतिक आवश्यकताएं क्या हैं और उस वक्त सहयोगी देशों के पास किस स्तर के सैन्य संसाधन उपलब्ध हैं। यह व्यावहारिक लचीलापन तीनों देशों की सरकारों को किसी भी बड़े संकट के समय अपनी परिस्थितियों के अनुसार बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने की पूरी छूट देता है।

तुर्किये ने दी कानूनी मंजूरी, संसद में पेश हुआ प्रस्ताव

इस त्रिपक्षीय गठबंधन को कानूनी रूप से मजबूत करने की दिशा में तुर्किये ने सबसे तेज कदम उठाया है। तुर्किये की सरकार ने इस रक्षा समझौते को आधिकारिक मंजूरी दिलाने के लिए अपनी संसद में पेश कर दिया है। अंकारा का यह कदम रियाद के साथ उसके पारस्परिक रक्षा संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है, खासकर ऐसे समय में जब सऊदी अरब को अपनी दक्षिणी सीमाओं पर यमन के हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) के लगातार ड्रोन और मिसाइल हमलों का सामना करना पड़ रहा है।

आपको बता दें कि तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan), सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Mohammed bin Salman) और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Shehbaz Sharif) ने बीते 7 अगस्त को पवित्र शहर मक्का में इस ऐतिहासिक समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए थे। उसी समय इन तीनों शीर्ष नेताओं ने यह साझा सिद्धांत दुनिया के सामने रखा था कि "किसी भी एक देश पर होने वाला सशस्त्र हमला, तीनों देशों पर हुआ हमला माना जाएगा।" इसके अलावा, आपसी सहयोग को बढ़ाने के लिए संयुक्त सैन्य अभ्यास (Joint Military Exercises), खुफिया जानकारी साझा करने (Intelligence Sharing) और रक्षा उत्पादन में मिलकर काम करने का भी बड़ा ऐलान किया गया था।

पाकिस्तान का पूर्ण समर्थन और तुर्किये का स्पष्ट रक्षात्मक रुख

वर्तमान में सऊदी अरब पर लगातार हो रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों के कारण यह नया रक्षा समझौता अपनी शुरुआती और सबसे बड़ी परीक्षा के दौर से गुजर रहा है। हाल ही में रियाद में हुई एक आपातकालीन उच्चस्तरीय बैठक में इन तीनों देशों ने सऊदी अरब की धरती पर अपनी सैन्य टुकड़ियों और रक्षा क्षमताओं की त्वरित तैनाती सुनिश्चित करने पर सहमति जताई है।

पाकिस्तान के सैन्य प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि इस्लामाबाद, सऊदी अरब की संप्रभुता, उसकी क्षेत्रीय अखंडता और वहां स्थित पवित्र इस्लामिक स्थलों की रक्षा के लिए हर संभव मदद देने को तैयार है। पाकिस्तान ने इन पवित्र स्थलों की सुरक्षा को अपने लिए सर्वोपरि और किसी भी समझौते से परे बताया है।

दूसरी तरफ, तुर्किये की भूमिका को लेकर भी स्थिति काफी हद तक साफ हो गई है। तुर्किये मुख्य रूप से आधुनिक सैन्य उपकरण, एडवांस्ड हथियार प्रणालियों और खुफिया नेटवर्क के जरिए इस गठबंधन में सहयोग करेगा। हालांकि, तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने यह साफ कर दिया है कि यह पूरी तरह से एक 'रक्षात्मक समझौता' (Defensive Pact) है, और तुर्किये किसी अन्य देश पर हमला करने या आक्रामक युद्ध लड़ने के लिए अपने सैनिकों को अपनी सीमाओं से बाहर नहीं भेजेगा। आने वाले दिनों में यह समझौता मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया की सुरक्षा समीकरणों को किस प्रकार प्रभावित करता है, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।