अमेरिका में होल्डिंग छिपा रहा चीन: दूसरे देशों के जरिए कर रहा बड़ा निवेश

अमेरिका में होल्डिंग छिपा रहा चीन: दूसरे देशों के जरिए कर रहा बड़ा निवेश

वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक मोर्चे पर एक बार फिर अमेरिका और चीन के बीच तनातनी अपने चरम पर पहुंच गई है। हाल ही में सामने आई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टों और बाजार विश्लेषणों के मुताबिक, ड्रैगन यानी चीन ने अमेरिका में अपनी प्रत्यक्ष आर्थिक होल्डिंग्स और सरकारी बॉन्ड की मौजूदगी को छिपाने के लिए एक नया और बेहद चालाक पैंतरा अपनाया है। पारंपरिक रूप से अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज और डॉलर परिसंपत्तियों को खुलकर अपने नाम रखने वाला चीन अब सीधे तौर पर दिखने से बच रहा है। इसके बजाय, वह कनाडा और अन्य तीसरे देशों के गैर-अमेरिकी कस्टोडियन बैंकों और वित्तीय मध्यस्थों के माध्यम से अपने पैसे को ठिकाने लगा रहा है। इस गुप्त रणनीति के तहत दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यह सुनिश्चित कर रही है कि वाशिंगटन की पैनी नजरों और संभावित प्रतिबंधों से बचा जा सके, जिसे कूटनीतिक गलियारों में चीन का नया 'डबल गेम' कहा जा रहा है।

अमेरिका की कड़ी नजर से बचने के लिए चीन का नया फाइनेंशियल रूट

वैश्विक वित्तीय बाजार पर पैनी नजर रखने वाले जानकारों और ब्लूमबर्ग जैसी एजेंसियों की रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि कनाडा जैसे देशों के पास अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड और सिक्योरिटीज की होल्डिंग्स में अचानक भारी उछाल आया है। इसके पीछे मुख्य रूप से बीजिंग की वह सोची-समझी रणनीति काम कर रही है जिसके तहत वह अमेरिकी ट्रेजरी डेट को सीधे अपने आधिकारिक खातों में दिखाने के बजाय चुपचाप तीसरे देशों के वित्तीय संस्थानों को कस्टोडियन के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। अमेरिकी प्रशासन और ट्रेजरी विभाग द्वारा चीन के खिलाफ लगातार कड़े आर्थिक उपाय और आउटबाउंड निवेश प्रतिबंध लागू किए जा रहे हैं। इन सख्त नियमों और भविष्य के भू-राजनीतिक तनावों से अपनी संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए ही चीन ने अपनी डॉलर होल्डिंग्स को दूसरे देशों के रास्ते रूट करना शुरू कर दिया है ताकि उसकी वास्तविक वित्तीय स्थिति पर्दे के पीछे ही रहे।

ड्रैगन के इस डबल गेम के पीछे छिपे हैं बड़े भू-राजनीतिक और आर्थिक मकसद

चीन द्वारा अपनी अमेरिकी होल्डिंग्स को छिपाने और वैकल्पिक रास्तों का उपयोग करने के पीछे कई गहरे रणनीतिक कारण जुड़े हुए हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि चीन नहीं चाहता कि वाशिंगटन को यह स्पष्ट रूप से पता चले कि वह अमेरिकी कर्ज और अर्थव्यवस्था में कितनी गहरी पैث बनाए हुए है। जब अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ वॉर या ट्रेड वॉर जैसी स्थितियां पैदा होती हैं, तो प्रत्यक्ष होल्डिंग्स खुली होने पर आर्थिक दबाव का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में तीसरे देशों के जरिए पैसा निवेश करने से चीन को यह फायदा मिलता है कि वह वैश्विक वित्तीय प्रणाली में अपनी दखल भी बनाए रखता है और अमेरिकी नियामकों की सीधी जांच के दायरे से भी बाहर रहता है। इसके अलावा, यह कदम चीन की उस व्यापक नीति का हिस्सा है जिसके तहत वह अपनी विदेशी मुद्रा भंडार और परिसंपत्तियों में विविधता लाकर खुद को पश्चिमी प्रतिबंधों के संभावित दुष्प्रभावों से पूरी तरह महफूज करना चाहता है।

वैश्विक वित्तीय बाजारों पर क्या होगा इस गुप्त रणनीति का असर

चीन के इस बदले हुए रुख और वित्तीय हेरफेर से अमेरिकी बॉन्ड मार्केट और वैश्विक निवेशकों के बीच गहरी चिंताएं पैदा हो गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि दुनिया की महाशक्तियां इस तरह के परोक्ष निवेश और कस्टोडियन बदलावों को ट्रैक करने में नाकाम रहती हैं, तो वैश्विक वित्तीय स्थिरता के लिए एक नया जोखिम खड़ा हो सकता है। अमेरिकी नीति निर्माताओं के लिए यह समझना बेहद जरूरी हो गया है कि पारंपरिक आंकड़ों से इतर किस तरह से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क का इस्तेमाल करके नियमों को दरकिनार किया जा रहा है। आने वाले दिनों में अमेरिका इस प्रकार की वित्तीय गतिविधियों पर शिकंजा कसने के लिए अपने नियमों को और अधिक कड़ा कर सकता है, जिसका सीधा असर वैश्विक व्यापार और कूटनीतिक संबंधों पर पड़ना तय है।