Bollywood Controversy : सेंसर बोर्ड पर फूटा जावेद अख्तर का गुस्सा कहा - बॉलीवुड की सच्चाई कड़वी है
News India Live, Digital Desk: अपने बेबाक और स्पष्ट विचारों के लिए मशहूर गीतकार, लेखक और राज्यसभा के पूर्व सदस्य जावेद अख्तर ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में सेंसरशिप और फिल्म निकायों (Film Bodies) के फैसलों पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने सीधे तौर पर सवाल उठाया है कि आखिर कैसे कुछ ऐसी फिल्मों को हरी झंडी मिल जाती है जिनमें कथित तौर पर अश्लीलता होती है, लेकिन जो फिल्में समाज की वास्तविकताओं और कड़वी सच्चाई को दर्शाती हैं, उन्हें अक्सर सेंसर कर दिया जाता है या उन पर रोक लगा दी जाती है.
क्या है जावेद अख्तर का मुद्दा?
जावेद अख्तर का कहना है कि:
- चुनिंदा सेंसरशिप: फिल्म निकाय, जिन्हें अक्सर सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) या सेंसर बोर्ड कहा जाता है, चुनिंदा तरीके से फिल्मों पर प्रतिबंध लगाते हैं या दृश्यों को हटाने की मांग करते हैं. उनकी इस आलोचना का आधार यह है कि समाज में व्याप्त समस्याओं, बुराइयों या यथार्थवादी चित्रण वाली फिल्मों को बेवजह सेंसर किया जाता है.
- अश्लीलता और दोहरा मापदंड: वहीं, ऐसी फिल्में जिनमें 'अश्लीलता' या 'फूहड़ता' साफ दिखती है, उन्हें आसानी से 'क्लियर' कर दिया जाता है. जावेद अख्तर का मानना है कि यह एक दोहरा मापदंड है, जहाँ कलात्मक अभिव्यक्ति की बजाय अन्य मापदंडों को प्राथमिकता दी जा रही है.
- कला पर प्रतिबंध: उनका यह भी तर्क है कि यह रवैया सिनेमा को समाज के आइने के तौर पर काम करने से रोकता है. फिल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं होतीं, बल्कि वे सामाजिक संवाद, विचारों को उत्तेजित करने और लोगों को सोचने पर मजबूर करने का शक्तिशाली माध्यम भी होती हैं. जब इन पर रोक लगाई जाती है, तो यह कलात्मक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है.
विवाद का इतिहास:
यह कोई नई बात नहीं है कि भारतीय सेंसरशिप बोर्ड अपने फैसलों को लेकर विवादों में रहा हो. कई फिल्मकारों और लेखकों ने अतीत में भी सेंसरशिप नियमों और उनके लागू होने के तरीकों पर सवाल उठाए हैं. अक्सर छोटे बजट की स्वतंत्र फिल्में या ऐसी फिल्में जो मुख्यधारा से अलग कुछ कहने की कोशिश करती हैं, उन्हें ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है.
जावेद अख्तर जैसे अनुभवी और सम्मानित व्यक्ति का यह बयान फिल्म इंडस्ट्री के भीतर और बाहर दोनों जगह बहस छेड़ सकता है. उनका मानना है कि फिल्में समाज को जागरूक करने और बदलने की शक्ति रखती हैं, और ऐसी फिल्मों पर प्रतिबंध लगाना सही नहीं है, जबकि मनोरंजन के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है. यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म निकाय इस आलोचना पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या भविष्य में उनके निर्णयों में कोई बदलाव आता है.