बांग्लादेश का कड़वा सच हसीना गईं, पर डर नहीं गया डेली स्टार के एडिटर का छलका दर्द, बताई आपबीती

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News India Live, Digital Desk : बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि अब "आजादी" की नई हवा बहेगी। सोचा था कि बोलने की आजादी होगी और मीडिया बिना डरे काम कर सकेगा। लेकिन ढाका से जो खबरें आ रही हैं, वे कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। वहां के सबसे प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार 'द डेली स्टार' (The Daily Star) के संपादक महफूज अनम का दर्द अब दुनिया के सामने आ गया है।

महफूज अनम, जिन्हें बांग्लादेश में बेबाक पत्रकारिता के लिए जाना जाता है, उन्होंने मौजूदा अंतरिम सरकार (जिसकी अगुवाई मोहम्मद यूनुस कर रहे हैं) और वहां के प्रदर्शनकारियों से एक सीधा और चुभने वाला सवाल पूछा है  "आखिर हमारा गुनाह क्या है?"

"कल तक हम साथ थे, आज गद्दार हो गए?"

महफूज अनम का कहना है कि यह वही अखबार है जिसने शेख हसीना के शासन में भी निडर होकर सच लिखा। जब छात्र सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे, तब 'द डेली स्टार' उनके साथ खड़ा था। अखबार ने शहीदों की कहानियां छापीं, आंदोलन को पूरा समर्थन दिया।

लेकिन अब विडंबना देखिए! सरकार बदलने के बाद, उन्हीं छात्रों और समर्थकों का एक गुट अब इस अखबार को "देश का दुश्मन" और "भारत का एजेंट" बता रहा है। महफूज अनम बताते हैं कि उनके ऑफिस के बाहर भड़काऊ पोस्टर लगाए जा रहे हैं और उन्हें डराया-धमकाया जा रहा है।

अनम की पीड़ा: 'लोकतंत्र का यह कैसा रूप है?'

एक कार्यक्रम में अपना दर्द साझा करते हुए अनम ने कहा कि उन पर बिना किसी सबूत के "दलाल" होने का ठप्पा लगाया जा रहा है। उन्होंने पूछा, "हमने हमेशा स्वतंत्र पत्रकारिता की। हसीना सरकार की गलतियों को भी छापा और आज भी हम सच के साथ हैं। फिर हमारे साथ यह सुलूक क्यों? क्या इसी बदलाव के लिए छात्रों ने जान दी थी?"

उनका इशारा साफ है कि चेहरे बदल गए हैं, लेकिन "असहिष्णुता" (Intolerance) वही पुरानी है। अगर कोई अखबार सवाल पूछे, तो उसे बंद कराने की धमकियां दी जा रही हैं।

बांग्लादेश कहां जा रहा है?

यह मामला सिर्फ महफूज अनम का नहीं है। यह बताता है कि बांग्लादेश में फिलहाल "भीड़ तंत्र" हावी हो रहा है। जो कोई भी यूनुस सरकार या मौजूदा सिस्टम पर सवाल उठाता है, उसे तुरंत टारगेट कर लिया जाता है। प्रेस की आजादी, जो किसी भी लोकतंत्र की पहली शर्त होती है, वहां इस वक्त सबसे ज्यादा खतरे में नजर आ रही है।

सोचिए, जिस मीडिया ने बदलाव की लड़ाई लड़ी, आज उसे ही अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। यह महफूज अनम का सवाल नहीं, बल्कि पूरे बांग्लादेश के भविष्य पर एक सवाल है।