बिहार में 7202 शिक्षकों और कर्मियों ने की थी 35.27 करोड़ की अवैध निकासी
बिहार के शिक्षा विभाग से इन दिनों एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा वित्तीय फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। राज्य के विभिन्न जिलों में कार्यरत हजारों शिक्षकों और शिक्षा विभाग के कर्मचारियों द्वारा फर्जी दस्तावेजों, गलत तरीके से वेतन निर्धारण और नियमों को ताक पर रखकर कुल 35 करोड़ 27 लाख रुपए से अधिक की अवैध निकासी (Illegal Withdrawal) का मामला उजागर हुआ है। जब विभाग के उच्च अधिकारियों और विजिलेंस सेल ने वित्तीय अनियमितताओं की इस गहरी परत को खंगाला, तो आंकड़े देखकर हर कोई हैरान रह गया। कुल 7202 शिक्षकों और कर्मियों की संलिप्तता इस अवैध खेल में पाई गई। हालांकि, इसके बाद शिक्षा विभाग ने बिना किसी नरमी के कड़ा रुख अख्तियार किया और युद्ध स्तर पर रिकवरी अभियान चलाया, जिसके परिणामस्वरूप अब तक लगभग 33 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि की वसूली सरकारी खजाने में की जा चुकी है। इस विस्तृत रिपोर्ट में हम आपको बताएंगे कि कैसे इस पूरे फर्जीड़े का खुलासा हुआ और विभाग की कार्रवाई ने किस तरह इन जालसाजों पर शिकंजा कसा।
कैसे खुला राज: फर्जी तरीके से वेतन और भत्तों की अवैध निकासी का पूरा खेल
राजधानी पटना से लेकर दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों तक फैले इस वित्तीय घोटाले का खुलासा तब हुआ जब शिक्षा विभाग द्वारा राज्यभर के शिक्षकों के वेतन वितरण, सर्विस बुक और वित्तीय रिकॉर्ड्स का डिजिटल ऑडिट कराया गया। ऑडिट के दौरान यह बात सामने आई कि राज्य के अलग-अलग जिलों में कई ऐसे शिक्षक और कर्मचारी हैं जिन्हें उनके वास्तविक वेतनमान या हक से कहीं अधिक राशि लगातार भेजी जा रही थी। कुछ मामलों में तो ऐसे लोग भी वेतन उठाते रहे जिन्होंने नौकरी छोड़ दी थी या जिनके कागजात पूरी तरह से फर्जी पाए गए थे। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा निदेशालय के अधिकारियों ने जब इसकी गहरी छानबीन की, तो पता चला कि मिलीभगत और प्रशासनिक सुस्ती का फायदा उठाकर कुल 7202 शिक्षकों और कर्मियों ने मिलकर सरकारी कोष से कुल 35 करोड़ 27 लाख रुपए की अवैध निकासी कर ली है। इस खुलासे के बाद महकमे में भूचाल आ गया और तुरंत कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए।
शिक्षा विभाग की ताबड़तोड़ कार्रवाई: सख्त नोटिस और वेतन रोकने का बड़ा कदम
मामले की गंभीरता को देखते हुए शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने इसे बहुत ही कड़ाई से लिया। सभी जिलों के जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) और जिला कार्यक्रम पदाधिकारियों (DPO) को यह सख्त निर्देश दिए गए कि वे अपने-अपने क्षेत्र के दोषी शिक्षकों और कर्मचारियों की सूची तैयार करें और उनसे एक-एक पाई का हिसाब वसूलें। विभाग ने चेतावनी दी कि जो लोग स्वेच्छा से अवैध रूप से निकाली गई राशि वापस नहीं करेंगे, उनके खिलाफ निलंबन, विभागीय कार्रवाई और आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जाएंगे। इस ताबड़तोड़ प्रशासनिक कार्रवाई के डर और विभाग की पैनी निगरानी के कारण दोषी कर्मियों के होश उड़ गए। चरणबद्ध तरीके से चलाए गए इस रिकवरी अभियान का नतीजा यह निकला कि देखते ही देखते आरोपियों ने अवैध रूप से ली गई राशि को वापस करना शुरू कर दिया, जिससे खजाने में लगभग 33 करोड़ रुपए की वापसी सुनिश्चित हो चुकी है।
शेष राशि की रिकवरी और भविष्य में इस तरह की धांधली रोकने के लिए पुख्ता डिजिटल सुधार
यद्यपि शिक्षा विभाग ने लगभग 33 करोड़ रुपए की बड़ी रिकवरी कर एक मिसाल पेश की है, लेकिन अभी भी कई ऐसे मामले हैं जहां शेष बची हुई राशि की वसूली के लिए प्रक्रिया जारी है। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बाकी बचे हुए दोषियों को भी बख्शा नहीं जाएगा और उनके खिलाफ कानूनी शिकंजा कसा जा रहा है। इस पूरी घटना ने एक बार फिर से इस बात को उजागर कर दिया है कि सरकारी महकमों में वित्तीय पारदर्शिता कितनी जरूरी है। इसे ध्यान में रखते हुए अब बिहार सरकार और शिक्षा विभाग ने वेतन भुगतान प्रणाली को पूरी तरह से ऑनलाइन, पारदर्शी और सेंट्रलाइज्ड (Centralized Salary System) कर दिया है ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति या शिक्षक इस प्रकार की अवैध निकासी करने की हिम्मत न जुटा सके। इस सख्त कदम से न केवल सरकारी धन की बर्बादी रुकेगी, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में भी एक नई शुचिता और अनुशासन देखने को मिलेगा।