DGP विनय कुमार ने अचानक लिया VRS, सरकार ने तत्काल दी मंजूरी और बना दिया नया मुख्य सूचना आयुक्त

DGP विनय कुमार ने अचानक लिया VRS, सरकार ने तत्काल दी मंजूरी और बना दिया नया मुख्य सूचना आयुक्त

बिहार के प्रशासनिक और पुलिस महकमे से एक अप्रत्याशित और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) विनय कुमार ने अपने पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति यानी वीआरएस (VRS) ले लिया है। गृह विभाग ने उनके आवेदन को बिना किसी विलंब के तत्काल प्रभाव से स्वीकृति प्रदान कर दी है। सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह रहा कि वीआरएस मंजूर होने के चंद घंटों के भीतर ही बिहार सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग ने एक नई आधिकारिक अधिसूचना जारी करते हुए पूर्व डीजीपी विनय कुमार को बिहार राज्य का नया 'मुख्य सूचना आयुक्त' (सीआईसी) नियुक्त कर दिया।

अचानक हुए इस बड़े फैसले ने राज्य के नौकरशाही गलियारों और राजनीतिक हलकों में हलचल तेज कर दी है। 1991 बैच के वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी विनय कुमार का मूल कार्यकाल दिसंबर 2026 में विधिवत रूप से समाप्त होना था। यानी उनकी नियमित सेवानिवृत्ति में अभी करीब तीन महीने का समय शेष था, लेकिन उससे पहले ही उन्होंने यह कदम उठाकर सबको चौंका दिया। वर्तमान में विनय कुमार निजी एवं स्वास्थ्य कारणों के चलते अवकाश पर चल रहे हैं और आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि छुट्टी से लौटते ही वे पटना स्थित राज्य सूचना आयोग के दफ्तर में विधिवत रूप से मुख्य सूचना आयुक्त के पद का कार्यभार संभालेंगे।

तीन महीने के नोटिस नियम में विशेष छूट: सरकार ने तत्काल प्रभाव से लगाई मुहर

अखिल भारतीय सेवा नियमावली के सामान्य प्रावधानों के अनुसार जब भी कोई शीर्ष नौकरशाह या आईपीएस अधिकारी वीआरएस के लिए आवेदन करता है, तो उसे सरकार को कम से कम तीन महीने पहले नोटिस देना अनिवार्य होता है। परंतु डीजीपी विनय कुमार के मामले में बिहार सरकार के गृह विभाग ने विशेष नियमों का उपयोग करते हुए इस तीन महीने के नोटिस पीरियड की बाध्यता से पूर्ण छूट प्रदान की।

गृह विभाग की ओर से जारी आधिकारिक अधिसूचना में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि आवेदक की ओर से दिए गए आवेदन और परिस्थितियों पर विचार करते हुए 'तीन महीने का नोटिस देने संबंधी नियमों में छूट' प्रदान की जाती है और उनका वीआरएस आवेदन तत्काल प्रभाव से स्वीकार किया जाता है। ठीक इसके बाद सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा दूसरी अधिसूचना जारी की गई, जिसमें उन्हें कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से अगले कार्यकाल के लिए बिहार राज्य मुख्य सूचना आयुक्त के संवैधानिक पद पर तैनात करने का आदेश पारित किया गया। इस त्वरित प्रशासनिक गतिशीलता ने यह साफ कर दिया है कि इस पूरे फेरबदल की पटकथा पहले से ही तैयार थी।

1991 बैच के तेजतर्रार आईपीएस अफसर: ऐसा रहा विनय कुमार का करियर

वर्ष 1991 में भारतीय पुलिस सेवा में चयनित हुए विनय कुमार की गिनती बिहार कैडर के सबसे सुलझे हुए, पेशेवर और गंभीर अफसरों में की जाती रही है। अपने तीन दशक से अधिक लंबे पुलिस करियर के दौरान उन्होंने राज्य के कई संवेदनशील और अपराध-प्रभावित जिलों में पुलिस अधीक्षक (एसपी) के रूप में काम किया। उन्होंने अपराध नियंत्रण, विधि-व्यवस्था के संधारण और नक्सल विरोधी अभियानों में कई अहम रणनीतियों को अंजाम दिया।

राज्य के पुलिस महानिदेशक के शीर्ष पद तक पहुंचने से पहले वे सीआईडी, विशेष शाखा (स्पेशल ब्रांच) और विभिन्न पुलिस प्रभागों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों को संभाल चुके हैं। पुलिस महकमे के आधुनिकीकरण और तकनीकी जांच प्रणालियों को मजबूत करने में उनकी भूमिका की काफी सराहना की गई थी। अब पुलिस सेवा की वर्दी उतारने के बाद वे एक अर्ध-न्यायिक और संवैधानिक संस्था यानी राज्य सूचना आयोग की कमान संभालने जा रहे हैं, जहां राज्य में सूचना के अधिकार (RTI) कानून के पारदर्शी क्रियान्वयन और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा का दायित्व उनके कंधों पर होगा।

डीजीपी के फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रिया: बीजेपी ने कहा- 'यह उनका निजी निर्णय, सम्मान जरूरी'

डीजीपी स्तर के शीर्ष अधिकारी द्वारा अचानक वीआरएस लेने और तुरंत एक नए आयोग के प्रमुख के रूप में नियुक्त किए जाने को लेकर बिहार के राजनीतिक गलियारों में भी तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विपक्ष जहां राज्य की कानून-व्यवस्था और नौकरशाही में चल रही खींचतान को लेकर इशारों-इशारों में सवाल खड़े कर रहा है, वहीं सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसे पूरी तरह सामान्य प्रशासनिक और व्यक्तिगत प्रक्रिया बताया है।

बीजेपी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेना किसी भी अधिकारी का अपना निजी और कानूनी अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विनय कुमार एक बेहद सक्षम, कर्तव्यनिष्ठ और अच्छे पुलिस अधिकारी रहे हैं, जिन्होंने राज्य की सेवा पूरी ईमानदारी से की है। सरावगी ने कहा कि जब किसी अधिकारी ने खुद अपनी इच्छा से वीआरएस लेने का फैसला किया है, तो समाज और व्यवस्था को उनके इस व्यक्तिगत निर्णय का सम्मान करना चाहिए। इसमें किसी भी तरह की राजनीति या विवाद तलाशना पूरी तरह अनुचित है।

राज्य सूचना आयोग में नई पारी: पारदर्शी प्रशासन के लिए क्या होंगी चुनौतियां

बिहार राज्य मुख्य सूचना आयुक्त का पद लंबे समय से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता रहा है, क्योंकि राज्य भर के विभिन्न सरकारी विभागों से जुड़ी जनहित की अपीलों और शिकायतों की सुनवाई इसी आयोग के अधीन होती है। सरकारी विभागों में पारदर्शिता लाने, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और आरटीआई कार्यकर्ताओं की याचिकाओं का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करना मुख्य सूचना आयुक्त की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल होता है।

चूंकि विनय कुमार के पास राज्य की पूरी प्रशासनिक मशीनरी, पुलिस व्यवस्था और शासन के कामकाज की अंदरूनी समझ का लंबा अनुभव है, इसलिए माना जा रहा है कि उनके नेतृत्व में सूचना आयोग के पेंडिंग मामलों के निपटारे में तेजी आएगी। पुलिस महकमे की शीर्ष कमान से निकलकर नागरिकों को सूचना का अधिकार दिलाने वाली संवैधानिक संस्था के सर्वोच्च पद तक का उनका यह सफर बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में एक नया अध्याय जोड़ने जा रहा है।