Bihar Politics: यूपी के मौर्य और राजस्थान के मेघवाल तय करेंगे बिहार का भविष्य? समझिए इस फैसले के पीछे की पूरी कहानी

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News India Live, Digital Desk: बिहार की राजनीति (Bihar Politics) को समझना टेढ़ी खीर है। यहाँ हर फैसले के पीछे एक गणित होता है, और वो गणित है'जाति' का। आज पटना के सियासी गलियारों में इसी गणित की चर्चा जोरों पर है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बिहार में विधायक दल का नेता चुनने के लिए तीन 'पर्यवेक्षकों' (Observers) के नाम तय किए हैं।

लेकिन रुकिए! यह सिर्फ एक सामान्य प्रक्रिया नहीं है। जिन तीन नामों को दिल्ली से पटना भेजा जा रहा है—केशव प्रसाद मौर्य, अर्जुन राम मेघवाल और साध्वी निरंजन ज्योति—यह भाजपा का अब तक का सबसे सोचा-समझा 'मास्टरस्ट्रोक' माना जा रहा है।

क्यों खास हैं ये तीन नाम?

अगर आप ध्यान से देखें, तो भाजपा ने इन तीनों के जरिए बिहार के पूरे जातीय समीकरण (Caste Equations) को साधने की कोशिश की है:

  1. केशव प्रसाद मौर्य (OBC चेहरा): यूपी के डिप्टी सीएम हैं और पिछड़ा वर्ग का बड़ा चेहरा माने जाते हैं। बिहार में पिछड़े वर्ग के वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए उनका आना बहुत मायने रखता है।
  2. साध्वी निरंजन ज्योति (EBC/निषाद समाज): ये अति-पिछड़ा वर्ग (EBC) से आती हैं। बिहार में EBC वोटरों की संख्या निर्णायक है, जिसे साधने की कोशिश नीतीश कुमार हमेशा करते रहे हैं।
  3. अर्जुन राम मेघवाल (दलित समाज): दलित समुदाय से आने वाले मेघवाल के जरिए भाजपा ने यह संदेश दिया है कि दलित नेतृत्व उनकी प्राथमिकता में है।

इसे कहते हैं 'सोशल इंजीनियरिंग'

राजनीतिक जानकारों की मानें तो, भाजपा ने 'एक तीर से कई निशाने' साधे हैं। यह महज एक नेता चुनने की औपचारिकता नहीं है, बल्कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 (Bihar Election 2025) के लिए पार्टी का शंखनाद है।

भाजपा विपक्ष (खासकर राजद और जेडीयू) को यह दिखाना चाहती है कि सिर्फ वे ही 'पिछड़ा-दलित' की राजनीति नहीं करते, बल्कि भाजपा भी इन समुदायों को सत्ता में भागीदारी देने के लिए पूरी तरह गंभीर है। जिस तरह से जातिगत जनगणना के बाद बिहार में माहौल बदला है, भाजपा का यह कदम बताता है कि वे अपनी सोशल इंजीनियरिंग को धार दे रहे हैं।

अगला सीएम या नेता कौन?

अब सवाल यह है कि ये तीन पर्यवेक्षक जिस नाम पर मुहर लगाएंगे, वह कौन होगा? चर्चाओं का बाजार गर्म है, लेकिन एक बात तय है—भाजपा का अगला चेहरा ऐसा होगा जो 2025 में पार्टी को सत्ता की कुर्सी तक ले जा सके।

बिहार की जनता और विरोधी दल, दोनों ही सांस रोके इस बैठक के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं। देखते हैं, दिल्ली का यह दांव पटना में कितना असर दिखाता है।