Bihar Elections : बिहार में 15 राजनीतिक दलों पर गिरेगी गाज, 6 साल से नहीं लड़ा एक भी चुनाव, EC लेगा बड़ा एक्शन

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News India Live, Digital Desk: लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को सत्ता तक पहुंचने का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता है, लेकिन बिहार में कई ऐसे दल भी हैं जो सिर्फ कागजों पर ही जिंदा हैं. पिछले छह सालों से न तो ये दल किसी चुनाव में उतरे हैं और न ही इनकी कोई राजनीतिक गतिविधि देखने को मिली है. अब ऐसे 15 "निष्क्रिय" राजनीतिक दलों पर चुनाव आयोग का डंडा चलने वाला है.

राज्य निर्वाचन आयोग ने इन 15 पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा है कि क्यों न उनकी मान्यता रद्द कर दी जाए.

क्या है पूरा मामला?

चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, किसी भी पंजीकृत राजनीतिक दल के लिए लगातार छह वर्षों तक चुनावों में भाग लेना अनिवार्य होता है. अगर कोई दल इस नियम का पालन नहीं करता, तो आयोग उसकी मान्यता खत्म करने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है.

बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के कार्यालय द्वारा की गई जांच में पाया गया कि राज्य में पंजीकृत 109 राजनीतिक दलों में से 15 दल ऐसे हैं, जिन्होंने पिछले छह सालों में न तो कोई लोकसभा चुनाव लड़ा है और न ही कोई विधानसभा चुनाव.

अब क्या कार्रवाई होगी?

निर्वाचन विभाग ने इन सभी 15 दलों को कारण बताओ नोटिस भेजा है. उन्हें 30 दिनों के अंदर यह जवाब देना होगा कि उन्होंने पिछले छह वर्षों में किसी भी चुनाव में भाग क्यों नहीं लिया. उन्हें यह भी बताना होगा कि क्यों उनकी पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द न किया जाए. अगर इन दलों की तरफ से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है या वे जवाब ही नहीं देते हैं, तो चुनाव आयोग इन सभी दलों की मान्यता रद्द करने की सिफारिश कर सकता है.

मान्यता रद्द होने का क्या मतलब है?

एक बार किसी पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाता है, तो वह चुनाव आयोग द्वारा आवंटित अपने चुनाव चिन्ह पर चुनाव नहीं लड़ सकती. इससे व्यावहारिक रूप से उस पार्टी का राजनीतिक अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है.

किन दलों पर लटकी है तलवार?

जिन 15 दलों को नोटिस जारी किया गया है, उनमें भारतीय एकता पार्टी, राष्ट्रीय मानव दल, भारतीय जनविकास पार्टी, राष्ट्रीय जनतांत्रिक पार्टी, आजाद हिंद फौज पार्टी, हमारा दल और किसान पार्टी जैसे कई छोटे दल शामिल हैं.

चुनाव आयोग का यह कदम राजनीति को साफ-सुथरा बनाने और सिर्फ कागजों पर चलने वाले या गैर-गंभीर दलों को सिस्टम से बाहर करने की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.