Bihar Election : संकल्प पत्र जारी हुआ और बिना बोले ही उठ गए नीतीश, नड्डा, चिराग समेत सब बड़े नेता
News India Live, Digital Desk : राजनीति में जो दिखता है, कई बार वो होता नहीं, और जो नहीं दिखता, उसके कई गहरे मायने होते हैं। ऐसा ही कुछ देखने को मिला गुरुवार को बिहार एनडीए (NDA) की उस महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस में, जिसे 2025 विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन की एकता और ताकत दिखाने का सबसे बड़ा मौका माना जा रहा था।
मौका था एनडीए के संयुक्त 'संकल्प पत्र' (घोषणापत्र) को जारी करने का। मंच पर बिहार एनडीए के सभी बड़े सूरमा मौजूद थे - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा और सम्राट चौधरी। माहौल ऐसा था कि आज एनडीए एकजुट होकर विपक्ष पर जोरदार हमला बोलेगा।
लेकिन हुआ कुछ ऐसा, जिसने पटना के सियासी गलियारों में एक नई और बड़ी बहस छेड़ दी है।
सिर्फ एक भाषण... और फिर सन्नाटा
प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत हुई और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने मंच संभाला। उन्होंने संकल्प पत्र की मुख्य बातों को मीडिया के सामने रखा और एनडीए सरकार की उपलब्धियां गिनाईं। उनका भाषण खत्म होने तक सब कुछ सामान्य लग रहा था।
लेकिन असली 'खेल' इसके बाद हुआ। जे.पी. नड्डा के भाषण के तुरंत बाद ही मंच पर एक अजीब सी खामोशी छा गई। वहां मौजूद पत्रकारों को उम्मीद थी कि अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बोलेंगे, फिर चिराग पासवान और गठबंधन के बाकी बड़े नेता भी अपनी बात रखेंगे।
परंतु, सबको हैरान करते हुए, जे.पी. नड्डा के बाद न तो नीतीश कुमार ने माइक पकड़ा, न चिराग ने, न मांझी ने और न ही कुशवाहा ने। मंच पर मौजूद सभी बड़े नेता एक-एक कर चुपचाप अपनी कुर्सी से उठे और प्रेस कॉन्फ्रेंस हॉल से बाहर चले गए, जिससे वहां मौजूद पत्रकार और बाकी लोग हक्के-बक्के रह गए।
क्यों नहीं बोला कोई दूसरा नेता?
इस 'महा-खामोशी' के बाद अब कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं:
- क्या कोई अंदरूनी नाराजगी है? सबसे पहला सवाल यही उठ रहा है कि क्या संकल्प पत्र के कुछ बिंदुओं को लेकर सहयोगियों के बीच कोई असहमति थी, जिसके कारण बाकी नेताओं ने बोलना उचित नहीं समझा?
- क्या यह सोची-समझी रणनीति थी? कुछ लोगों का मानना है कि यह एक रणनीति भी हो सकती है, जिसमें यह तय किया गया हो कि सिर्फ गठबंधन के सबसे बड़े राष्ट्रीय नेता (जे.पी. नड्डा) ही बोलेंगे ताकि कोई विरोधाभासी बयान सामने न आए।
- समय की कमी या कुछ और? एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि शायद समय की कमी के चलते ऐसा हुआ हो, क्योंकि नेताओं को आगे रैलियों के लिए भी निकलना था। हालांकि, इतने बड़े मौके पर इस तर्क को ज्यादा महत्व नहीं दिया जा रहा है।
वजह चाहे जो भी हो, लेकिन इस एक घटना ने विपक्ष, खासकर आरजेडी को एनडीए पर हमला बोलने का एक बड़ा मौका दे दिया है। आरजेडी का कहना है कि यह एनडीए के अंदर चल रही 'महा-खिटखिट' का सबूत है, जहां कोई भी नेता एक-दूसरे के साथ सहज नहीं है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि एनडीए के नेता इस अजीबोगरीब चुप्पी पर क्या सफाई देते हैं। फिलहाल, उनकी यह खामोशी उनके संकल्प पत्र के वादों से ज्यादा शोर मचा रही है।