Bihar Election Analysis : राजनीति का वो दांव जो हमेशा उल्टा पड़ जाता है,क्या मोदी पर सीधा हमला विपक्ष का सेल्फ गोल है

Post

News India Live, Digital Desk: Bihar Election Analysis : राजनीति की बिसात पर हर चाल बहुत सोच-समझकर चलनी पड़ती है, क्योंकि यहाँ एक गलत कदम पूरी बाजी पलट सकता है। भारतीय राजनीति में पिछले कुछ सालों से एक सवाल बार-बार उठता रहा है - क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखे और व्यक्तिगत हमले करना विपक्ष की सबसे बड़ी भूल साबित होती है? हाल की कुछ घटनाओं, खासकर बिहार में तेजस्वी यादव और राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी के बयानों को देखकर यह बहस फिर से तेज़ हो गई है।

इतिहास गवाह है, जब-जब हुआ सीधा हमला, बीजेपी को मिला फायदा

यह कोई नई बात नहीं है। याद कीजिए, जब गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने "मौत का सौदागर" वाली टिप्पणी की थी। बीजेपी ने इसे गुजरात की अस्मिता पर हमला बताकर ऐसा माहौल बनाया कि कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

फिर 2014 के चुनाव से ठीक पहले, कांग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर ने मोदी के लिए "नीच किस्म का आदमी" जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। प्रधानमंत्री मोदी ने इस टिप्पणी को अपनी पिछड़ी जाति और गरीब पृष्ठभूमि से जोड़कर एक भावनात्मक हथियार बना लिया। उन्होंने रैलियों में कहा कि यह उनका नहीं, बल्कि देश के हर गरीब और पिछड़े व्यक्ति का अपमान है। नतीजा सबके सामने था।

यही कहानी 2019 के लोकसभा चुनाव में भी दोहराई गई। राहुल गांधी ने "चौकीदार चोर है" का नारा बुलंद किया। जवाब में बीजेपी ने "मैं भी चौकीदार" नाम से एक देशव्यापी अभियान छेड़ दिया। यह अभियान इतना सफल रहा कि विपक्ष का लगाया गया आरोप ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गया।

यह फॉर्मूला काम कैसे करता है?

सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? राजनीतिक जानकार मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी इस तरह के व्यक्तिगत हमलों को एक अवसर में बदलने में माहिर हैं। जब भी उन पर कोई निजी टिप्पणी की जाती है, तो वे उसे तुरंत अपनी पहचान, अपनी जाति, अपनी गरीबी या फिर देश की अस्मिता से जोड़ देते हैं।

वे इसे "अहंकारी élite" बनाम "एक गरीब चायवाले के बेटे" की लड़ाई बना देते हैं। इससे आम जनता में एक सहानुभूति की लहर पैदा होती है, और जो वोट बंटे हुए होते हैं, वे भी एकजुट होकर बीजेपी के पाले में चले जाते हैं। विपक्ष का हमला उन्हीं के लिए एक "सेल्फ गोल" बन जाता है।

क्या तेजस्वी और राहुल वही गलती दोहरा रहे हैं?

अब सवाल बिहार और आने वाले चुनावों का है। क्या तेजस्वी यादव, राहुल गांधी और पूरा महागठबंधन उसी जाल में फंस रहा है, जिसमें कांग्रेस पहले कई बार फंस चुकी है? क्या प्रधानमंत्री पर सीधे और अभद्र भाषा में किए गए हमले उन्हें सियासी फायदा पहुँचाने की जगह, खुद उनके लिए ही एक बड़ी मुसीबत खड़ी कर देंगे?

इतिहास को देखें तो जवाब 'हाँ' लगता है, लेकिन राजनीति में हर दिन नया होता है। पर एक बात तो तय है कि विपक्ष को अगर मोदी को घेरना है, तो उन्हें मुद्दों पर बात करनी होगी, क्योंकि व्यक्तिगत हमलों का खेल अब तक तो उन्हीं पर भारी पड़ा है।