नक्सलवाद पर संसद से सड़क तक संग्राम प्रियंका चतुर्वेदी और अमित शाह के बीच तीखी बहस, कांग्रेस ने बीजेपी को घेरा
News India Live, Digital Desk: देश में नक्सलवाद के मुद्दे पर एक बार फिर राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। हाल के दिनों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए बड़े ऑपरेशनों और उसके बाद आए राजनीतिक बयानों ने संसद से लेकर सोशल मीडिया तक बहस छेड़ दी है। शिवसेना (UBT) की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच आंकड़ों और रणनीति को लेकर तीखी नोकझोंक देखने को मिली है। वहीं, कांग्रेस सांसद माणिक्यम टैगोर ने भी केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए इस बहस को त्रिकोणीय बना दिया है।
प्रियंका चतुर्वेदी का वार: 'आंकड़े कुछ और, हकीकत कुछ और'
सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने केंद्र सरकार के उन दावों को चुनौती दी है जिनमें कहा गया था कि नक्सलवाद अब अपनी अंतिम सांसें ले रहा है। उन्होंने हालिया नक्सली हमलों और जवानों की शहादत का हवाला देते हुए पूछा कि यदि नक्सलवाद खत्म हो रहा है, तो हिंसा की घटनाएं क्यों नहीं रुक रही हैं? उन्होंने सरकार पर केवल 'हेडलाइन मैनेजमेंट' करने का आरोप लगाया और कहा कि जमीनी स्तर पर सुरक्षा बलों को और अधिक संसाधनों और स्पष्ट विजन की आवश्यकता है।
अमित शाह का पलटवार: 'नक्सलवाद का अंत निश्चित है'
गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के आरोपों का करारा जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई है। शाह ने संसद में आंकड़े पेश करते हुए बताया कि पिछले एक दशक में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 70% से अधिक की कमी आई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सुरक्षा बल अब नक्सलियों के 'मांद' (Garh) में घुसकर प्रहार कर रहे हैं, जो पिछली सरकारों के समय नामुमकिन लगता था। शाह ने स्पष्ट किया कि विकास और सुरक्षा के दोहरे प्रहार से नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने की समय सीमा तय कर दी गई है।
कांग्रेस और राहुल गांधी का रुख: 'विभाजनकारी नीतियों से बढ़ रहा असंतोष'
कांग्रेस की ओर से माणिक्यम टैगोर ने बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा कि सरकार केवल बल प्रयोग कर रही है, जबकि आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की रक्षा नहीं की जा रही है। राहुल गांधी के विचारों का समर्थन करते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि केंद्र की नीतियां आदिवासियों में असंतोष पैदा कर रही हैं, जिसका फायदा नक्सली संगठन उठा रहे हैं। कांग्रेस ने मांग की है कि सरकार को केवल सैन्य कार्रवाई के बजाय सामाजिक और आर्थिक न्याय पर भी ध्यान देना चाहिए।
सियासी घमासान के बीच सुरक्षा बल अलर्ट
नेताओं के बीच चल रही इस जुबानी जंग के बीच छत्तीसगढ़, झारखंड और महाराष्ट्र के सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा बल हाई अलर्ट पर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, नक्सलवाद और आंतरिक सुरक्षा का मुद्दा और भी गरमाएगा। सरकार जहां इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है, वहीं विपक्ष इसे सरकार की विफलता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है।