Bangladesh Election : क्या बांग्लादेश में खत्म हो रहा है जमात-ए-इस्लामी का वजूद? जानें क्यों धराशायी हुआ कट्टरपंथी किला!

Post

News India Live, Digital Desk: बांग्लादेश के हालिया चुनाव परिणामों ने न केवल सत्ता का चेहरा बदला है, बल्कि वहां की कट्टरपंथी राजनीति के भविष्य पर भी बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। एक समय बांग्लादेश की राजनीति में 'किंगमेकर' की भूमिका निभाने वाली जमात-ए-इस्लामी (Jamaat-e-Islami) इस बार चुनाव मैदान में बुरी तरह पिछड़ गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसके पीछे शेख हसीना की अवामी लीग और बदलता जनमत सबसे बड़े कारक हैं।

जमात की दुर्गति के 3 मुख्य कारण

जमात-ए-इस्लामी, जो कभी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के साथ मिलकर सरकार चलाती थी, आज हाशिए पर क्यों है? इसके पीछे ये ठोस कारण नजर आते हैं:

अवामी लीग का 'जीरो टॉलरेंस' मॉडल: शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने कट्टरपंथी संगठनों पर नकेल कसने के लिए सख्त रुख अपनाया। युद्ध अपराधों (War Crimes) के मामलों में जमात के शीर्ष नेताओं को मिली सजा ने पार्टी की कमर तोड़ दी।

युवाओं का मोहभंग: बांग्लादेश की नई पीढ़ी अब धार्मिक ध्रुवीकरण के बजाय विकास, रोजगार और डिजिटल अर्थव्यवस्था की बात कर रही है। जमात का पुराना एजेंडा युवाओं को आकर्षित करने में नाकाम रहा।

पंजीकरण का संकट: चुनाव आयोग द्वारा जमात का पंजीकरण रद्द किए जाने और कानूनी उलझनों की वजह से पार्टी एक संगठित इकाई के रूप में चुनाव लड़ने में संघर्ष करती दिखी।

अवामी लीग फैक्टर: कैसे पलटी बाजी?

अवामी लीग ने बड़ी चतुराई से जमात-ए-इस्लामी को 'देश विरोधी' और 'प्रगति विरोधी' खेमे में धकेल दिया।

धर्मनिरपेक्षता का कार्ड: शेख हसीना ने देश के मुक्ति संग्राम (1971) की भावनाओं को पुनर्जीवित किया, जिसमें जमात की भूमिका विवादास्पद रही थी।

सुरक्षा और स्थिरता: जनता के बीच यह संदेश देने में कामयाबी मिली कि अगर जमात और उसके सहयोगी सत्ता में आए, तो देश में अस्थिरता और कट्टरपंथ बढ़ेगा।

बीएनपी (BNP) के लिए भी बनी मुसीबत?

कभी जमात का साथ पाकर सत्ता तक पहुंचने वाली बीएनपी के लिए भी यह गठबंधन अब 'गले की हड्डी' बनता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय दबाव और उदारवादी मतदाताओं को लुभाने के लिए बीएनपी को भी जमात से दूरी बनाने पर विचार करना पड़ रहा है।