Assam Polygamy Ban : क्या यूपी बिहार से ज्यादा मेघालय में है बहुविवाह? जानिये NFHS सर्वे का सच
News India Live, Digital Desk : पिछले कुछ दिनों से असम की राजनीति और मीडिया में एक शब्द बार-बार गूंज रहा है बहुविवाह' (Polygamy)। यानी एक पति का एक ही समय में एक से ज्यादा पत्नियों के साथ शादी करके रहना। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Himanta Biswa Sarma) ने साफ कर दिया है कि उनकी सरकार इस प्रथा को पूरी तरह बैन करने जा रही है।
सुनने में यह किसी एक धर्म या समुदाय से जुड़ा मुद्दा लग सकता है, लेकिन अगर हम सरकारी आंकड़ों (NFHS Data) की गहराइयों में जाएं, तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। आइए, बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर चल क्या रहा है।
असम सरकार क्या करने जा रही है?
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एलान किया है कि आने वाले विधानसभा सत्र में एक विधेयक (Bill) लाया जाएगा, जो असम में बहुविवाह को अवैध घोषित करेगा। सरकार का तर्क है कि महिलाओं को सम्मान और बराबरी का अधिकार दिलाने के लिए यह जरूरी है। इसके लिए एक एक्सपर्ट कमिटी भी बनाई गई थी, जिसने कहा है कि राज्य सरकार के पास ऐसा कानून बनाने का अधिकार है। यानी, अब असम में 'दूसरी शादी' करना कानूनन जुर्म बनने की कगार पर है।
नॉर्थ-ईस्ट (पूर्वोत्तर) के आंकड़े क्यों चौंकाते हैं?
हम आमतौर पर मानते हैं कि एक से ज्यादा शादी का चलन कुछ खास धार्मिक समुदायों तक सीमित है। लेकिन नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के आंकड़े इस सोच को चुनौती देते हैं।
आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत में बहुविवाह की दर सबसे ज्यादा जिन राज्यों में है, वे पूर्वोत्तर भारत के राज्य हैं।
- मेघालय (Meghalaya): यहाँ बहुविवाह की दर 2.4% है, जो देश में सबसे ज्यादा है।
- मिजोरम (Mizoram): यहाँ यह आंकड़ा 4.1% के आसपास देखा गया था (कुछ विशेष जिलों में)।
- इसके अलावा सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में भी यह चलन कई जगह मौजूद है।
आखिर वहां ऐसा क्यों है?
इसकी वजह सिर्फ 'धर्म' नहीं है। पूर्वोत्तर भारत में कई आदिवासी जनजातियां (Tribes) रहती हैं। इन समुदायों की अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराएं हैं।
खेतीकिसानी: पहाड़ी इलाकों में खेती के लिए ज्यादा लोगों की जरूरत होती है, इसलिए ऐतिहासिक रूप से वहां एक से ज्यादा पत्नियां रखने का चलन रहा है ताकि काम में हाथ बंटाने वाले लोग मिल सकें।
सामाजिक सुरक्षा: पुराने समय में युद्ध या कबीलाई झगड़ों के कारण, विधवा महिलाओं को सहारा देने के लिए भी यह प्रथा चली आ रही थी।
लेकिन अब वक्त बदल रहा है। आधुनिक समाज में इस प्रथा को महिलाओं के अधिकारों का हनन माना जाता है।
क्या यह सिर्फ एक समुदाय की बात है?
बिल्कुल नहीं। आंकड़े बताते हैं कि बहुविवाह की प्रथा ईसाई, मुस्लिम और हिंदू तीनों समुदायों में अलग अलग रूप और अनुपात में मौजूद है। ओडिशा, गोवा और तेलंगाना जैसे राज्यों में भी इसके मामले देखने को मिलते हैं। इसलिए इसे केवल एक धार्मिक चश्मे से देखना गलत होगा; यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दा भी है।