Artemis 2 launch : 54 साल बाद इंसान ने फिर भरी चांद की उड़ान आर्टेमिस 2 तो बस ट्रेलर है, जानिए नासा को क्यों आई मून मिशन की याद?
News India Live, Digital Desk: बुधवार का दिन अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक नए युग का गवाह बना। अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित कैनेडी स्पेस सेंटर से एक 32 मंजिला विशालकाय रॉकेट चार अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर चांद की ओर निकल पड़ा है। 1972 के ऐतिहासिक अपोलो 17 मिशन के बाद यह पहला मौका है जब इंसान चांद के इतने करीब जा रहा है। हालांकि, अगर आपको लग रहा है कि ये यात्री चांद की सतह पर चहलकदमी करेंगे, तो आप गलत हैं। नासा का यह 'आर्टेमिस 2' मिशन एक भव्य रिहर्सल मात्र है। असली करतब तो 2028 में देखने को मिलेगा, जब आधी सदी के बाद मनुष्य एक बार फिर चांद की सतह पर अपने कदम रखेगा।
सिर्फ रिहर्सल क्यों है आर्टेमिस 2 मिशन? इस ऐतिहासिक उड़ान में नासा के नए ओरियन स्पेसक्राफ्ट के जरिए चार अंतरिक्ष यात्री- कमांडर रीड वाइजमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और कनाडा के जेरेमी हैनसेन भेजे गए हैं। यह अब तक का सबसे विविध दल है, जिसमें पहली बार एक महिला, एक अश्वेत और एक गैर-अमेरिकी नागरिक शामिल हैं। ये यात्री अपनी 10 दिनों की यात्रा में चांद पर उतरेंगे नहीं, बल्कि शुरुआत में पृथ्वी की कक्षा में 25 घंटे बिताकर कैप्सूल के सिस्टम की जांच करेंगे। इसके बाद वे चांद की तरफ बढ़ेंगे और उसके पास से गुजरते हुए 6,400 किलोमीटर आगे तक का सफर तय करेंगे। इसके बाद यह कैप्सूल यू-टर्न लेकर सीधे प्रशांत महासागर में गिरेगा। नासा का मकसद इस मिशन के जरिए अपने नए 'स्पेस लॉन्च सिस्टम' (SLS) रॉकेट, लाइफ सपोर्ट सिस्टम और हीट शील्ड का 100 प्रतिशत सुरक्षित परीक्षण करना है।
54 साल का लंबा सन्नाटा: आखिर क्यों चांद को भूल गया था अमेरिका? जिन लोगों ने 60 और 70 के दशक में अमेरिका के धड़ाधड़ मून मिशन देखे थे, उनके मन में यह सवाल जरूर उठता है कि अमेरिका 54 सालों तक चांद से दूर क्यों रहा? इसके पीछे कई अहम कारण थे। 1960 के दशक में सोवियत संघ के साथ चल रही 'स्पेस रेस' जीतने के बाद अमेरिका ने अपनी बादशाहत साबित कर दी थी, जिसके बाद नासा के बजट में भारी कटौती कर दी गई। इसके अलावा अपोलो मिशन बहुत जोखिम भरे थे और उस दौर की तकनीक आज के स्मार्टफोन से भी कमजोर थी। ऐसे में अंतरिक्ष यात्रियों की जान जोखिम में डालना समझदारी नहीं थी। बाद में नासा ने अपना पूरा ध्यान अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) और पृथ्वी की निचली कक्षा पर केंद्रित कर दिया था।
नई 'स्पेस रेस' और चीन का बढ़ता दबदबा आज अंतरिक्ष के समीकरण पूरी तरह से बदल चुके हैं। चीन अब अंतरिक्ष क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है और चांद पर अपना स्थायी बेस बनाने की तैयारी में है। अमेरिका किसी भी कीमत पर अंतरिक्ष का यह 'सुपरपावर' ताज चीन के हाथों में नहीं जाने देना चाहता। यह 21वीं सदी की नई स्पेस रेस है। इसके साथ ही, नासा का असली और अंतिम लक्ष्य मंगल ग्रह है। पृथ्वी से सीधे मंगल जाना बहुत महंगा और मुश्किल है, इसलिए नासा चांद को एक 'बेस कैंप' या 'पेट्रोल पंप' की तरह इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है। अंतरिक्ष यात्री पहले चांद पर रुकना सीखेंगे, तकनीक का परीक्षण करेंगे और फिर वहां से मंगल ग्रह की लंबी उड़ान भरेंगे।
चांद पर मिला पानी का खजाना और 2028 का महात्वाकांक्षी प्लान हाल ही में वैज्ञानिकों ने चांद के दक्षिणी ध्रुव के अंधेरे गड्ढों में बर्फ के रूप में भारी मात्रा में पानी खोजा है। यह पानी भविष्य के मिशनों के लिए किसी खजाने से कम नहीं है, क्योंकि इससे पीने का पानी, ऑक्सीजन और सबसे जरूरी रॉकेट का ईंधन (हाइड्रोजन) तैयार किया जा सकता है। स्पेसएक्स और ब्लू ओरिजिन जैसी प्राइवेट कंपनियों की मदद से अब अंतरिक्ष यात्रा का खर्च भी काफी कम हो गया है। आर्टेमिस 2 की सफलता के बाद नासा 2028 में आर्टेमिस 3 मिशन लॉन्च करेगा, जिसके तहत इंसानों को सीधे चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतारा जाएगा। नासा का स्पष्ट कहना है कि वे इस बार सिर्फ झंडा गाड़ने नहीं जा रहे हैं, बल्कि उनका लक्ष्य चांद की कक्षा में 'लूनर गेटवे' स्पेस स्टेशन बनाकर वहां एक स्थायी बस्ती बसाने की बुनियाद रखना है।