इतिहास के पन्नों में यूपी का एक और सुनहरा अध्याय: भारत में लोहे का सबसे पुराना सबूत यहीं मिला था!

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जब भी हम भारत के प्राचीन इतिहास की बात करते हैं, तो अक्सर सिंधु घाटी सभ्यता या वैदिक काल का जिक्र होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस लोहे ने पूरी दुनिया में सभ्यताओं के विकास को एक नई रफ्तार दी, उसका भारत में सबसे पुराना सबूत कहीं और नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में मिला है?

यह खोज इतिहास की किताबों में दर्ज पुरानी धारणाओं को पूरी तरह बदल देती है और उत्तर प्रदेश को प्राचीन भारत के नक्शे पर और भी महत्वपूर्ण बना देती है।

कहां और क्या मिला था?

यह महत्वपूर्ण खोज उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में स्थित मल्हार नाम के एक गांव में हुई थी। पुरातत्वविद राकेश तिवारी की अगुवाई में हुई खुदाई में यहां लोहे को गलाने वाली प्राचीन भट्टियां, लोहे से बने औजार जैसे कीलें और हंसिया, और लोहे का मलबा (slag) मिला था।

जब इन चीजों की कार्बन डेटिंग कराई गई, तो जो नतीजा सामने आया, उसने इतिहासकारों को भी हैरान कर दिया। पता चला कि ये सबूत ईसा से 1500 साल पुराने हैं!

क्यों खास है यह खोज?

इस खोज से पहले, यह माना जाता था कि भारत में लोहे का इस्तेमाल गंगा घाटी के इलाकों में लगभग 1000 ईसा पूर्व शुरू हुआ था। लेकिन मल्हार गांव की खोज ने इस समय को 500 साल और पीछे धकेल दिया।

इसका मतलब है कि जब दुनिया की कई सभ्यताएं पाषाण और कांस्य युग में जी रही थीं, तब उत्तर प्रदेश की धरती पर हमारे पूर्वज लोहे को गलाकर उसे औजारों की शक्ल देना सीख चुके थे। यह खोज साबित करती है कि भारत में, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में, तकनीकी विकास कितना उन्नत था।

यह खोज सिर्फ एक ऐतिहासिक तथ्य नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि उत्तर प्रदेश की भूमि सदियों से ज्ञान, विज्ञान और नवाचार का केंद्र रही है।