गठबंधन का साथ या मजबूरी? बिहार में हार के बाद क्यों टूट की कगार पर है I.N.D.I.A एलायंस

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News India Live, Digital Desk : भारतीय राजनीति का एक पुराना नियम रहा है जब जीत मिलती है, तो उसका श्रेय सब में बंटता है, लेकिन जब हार मिलती है, तो उसका ठीकरा सबसे बड़े साझेदार पर फोड़ा जाता है। साल 2025 का अंत आते-आते बिहार के चुनावी नतीजों ने विपक्षी गठबंधन 'I.N.D.I.A' के भीतर ऐसी ही कड़वाहट भर दी है। हार का गम तो अपनी जगह है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या ये गठबंधन आगे भी टिक पाएगा?

सहयोगी दलों की टेढ़ी नजरें

बिहार के नतीजों के बाद से ही गठबंधन के भीतर से तीखे सुर निकलने लगे हैं। सहयोगी दलों, खास तौर पर क्षेत्रीय क्षत्रपों का मानना है कि कांग्रेस की कमजोरी की वजह से पूरे गठबंधन को नुकसान उठाना पड़ा। दबी जुबान में अब ये चर्चा शुरू हो गई है कि क्या कांग्रेस 'स्ट्राइक रेट' के मामले में पीछे छूटती जा रही है? यह बात कांग्रेस के स्थानीय नेताओं को चुभ रही है। उनका तर्क है कि अगर हार का जिम्मेदार सिर्फ कांग्रेस को ठहराया जाएगा, तो आत्मसम्मान के साथ समझौता करना मुश्किल होगा।

कार्यकर्ताओं की मांग: 'कब तक दूसरों की बैसाखी पर चलेंगे?'

बिहार में जमीनी स्तर पर काम करने वाले कांग्रेस कार्यकर्ताओं में एक बड़ी टीस है। वे दिल्ली में बैठे आलाकमान से सवाल कर रहे हैं कि आखिर कब तक पार्टी अपनी जमीन दूसरों को दान में देती रहेगी? गठबंधन की मजबूरियों में कांग्रेस उन सीटों पर भी नहीं लड़ पाती जहाँ उसका अपना मजबूत आधार रहा है। अब पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा ऐसा है, जो यह दबाव बना रहा है कि कांग्रेस को अब 'एकला चलो रे' की नीति अपनानी चाहिए ताकि 2026 और आने वाले लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी का कैडर फिर से जीवित हो सके।

2026: एक मुश्किल और जरूरी फैसला

2026 में होने वाले चुनाव न सिर्फ कांग्रेस बल्कि पूरे विपक्ष के लिए अस्तित्व की लड़ाई बन सकते हैं। कांग्रेस अगर अकेले लड़ती है, तो शुरुआत में हार का जोखिम तो होगा, लेकिन कम से कम उसकी अपनी पहचान फिर से खड़ी हो पाएगी। वहीं दूसरी ओर, गठबंधन में बने रहना राजनीतिक सुरक्षा तो देता है, लेकिन संगठन की धार को कुंद कर देता है। बिहार की हार ने इसी कशमकश को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है।

सिर्फ हार नहीं, नेतृत्व का भी है सवाल

यह केवल चुनावी सीटों की बात नहीं है, बल्कि यह सवाल है उस विजन का जो राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने पेश किया था। क्या सहयोगी दल अब राहुल गांधी को अपना निर्विवाद नेता मानने को तैयार होंगे? या फिर आने वाले दिनों में ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे जैसे नेता अपनी-अपनी शर्तों पर आगे बढ़ेंगे? बिहार के परिणामों ने सहयोगियों के हाथ में एक नया हथियार दे दिया है जिससे वे कांग्रेस पर मोलभाव का दबाव और बढ़ाएंगे।

आगे क्या होगा?

राजनीति में कोई भी रास्ता स्थाई नहीं होता। बिहार के कड़वे अनुभव ने कांग्रेस को फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है। फिलहाल आलाकमान इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। लेकिन कार्यकर्ताओं की नाराजगी और सहयोगियों की बेरुखी अगर जारी रही, तो 'इंडी गठबंधन' की यह गांठ ज्यादा दिन टिकना मुश्किल है।

क्या कांग्रेस वाकई अपनी पुरानी लय में लौटने के लिए अकेले मैदान में उतरने का साहस दिखाएगी या फिर चुनावी समझौतों का सिलसिला इसी तरह जारी रहेगा? इसका फैसला अगले कुछ महीनों की रणनीति में साफ हो जाएगा।