90s Indian Ads : जब मिले सुर मेरा तुम्हारा के लिए नसीरुद्दीन शाह ने कर दिया था मना, पीयूष पांडे ने खोला था सालों पुराना राज

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News India Live, Digital Desk : मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा" - ये सिर्फ एक गीत की पंक्तियां नहीं, बल्कि 90 के दशक में बड़े हुए हर भारतीय की आत्मा का हिस्सा हैं। इस गीत को बनाने वाले, विज्ञापनों के जादूगर पीयूष पांडे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके बनाए विज्ञापन और यह गीत हमेशा हमारी यादों में जिंदा रहेंगे। इस गीत से जुड़ा एक ऐसा ही दिलचस्प किस्सा है, जो शायद बहुत कम लोग जानते हैं। क्या आप जानते हैं कि देश को एक सूत्र में पिरोने वाले इस गीत का हिस्सा बनने से हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने साफ इनकार कर दिया था?

यह खुलासा खुद पीयूष पांडे ने अपनी किताब 'पांडेमोनियम' में किया था। उन्होंने बताया कि कैसे उस दौर के लगभग हर बड़े सितारे को इस राष्ट्रीय गीत में शामिल किया गया था, लेकिन नसीरुद्दीन शाह इसके लिए राजी नहीं हुए।

क्यों किया था नसीरुद्दीन शाह ने इनकार?

जब 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' का कॉन्सेप्ट तैयार हुआ, तो इसे बनाने वाली एजेंसी (ओगिल्वी एंड माथर) ने देश के हर क्षेत्र से, हर भाषा के बड़े-बड़े सितारों से संपर्क किया। अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती, शर्मिला टैगोर से लेकर कमल हासन और लता मंगेशकर तक, हर कोई खुशी-खुशी इस ऐतिहासिक प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने के लिए तैयार हो गया।

लेकिन जब टीम नसीरुद्दीन शाह के पास पहुंची, तो उन्हें एक unexpected जवाब मिला। नसीरुद्दीन शाह ने इस विज्ञापन में काम करने से मना कर दिया।

क्या थी वजह?
पीयूष पांडे ने बताया कि नसीरुद्दीन शाह को लगा कि यह एक "सरकारी प्रोपेगेंडा" है। उन्हें यह महसूस हुआ कि यह गीत सरकार अपनी छवि चमकाने के लिए बनवा रही है और वह किसी भी तरह के सरकारी प्रचार का चेहरा नहीं बनना चाहते थे। उस दौर में, कई कलाकार सरकारी प्रोजेक्ट्स को लेकर थोड़े शंकित रहते थे, और नसीरुद्दीन शाह अपनी कला और सिद्धांतों को लेकर हमेशा से ही बहुत मुखर रहे हैं।

पीयूष पांडे ने क्या कहा था?

पीयूष पांडे ने उनकी इस सोच का सम्मान किया। उन्होंने कभी इस बात पर कोई विवाद नहीं बनाया। उन्होंने समझा कि हर कलाकार का अपना एक नजरिया होता है और किसी को भी जबरदस्ती किसी प्रोजेक्ट का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता।

यह किस्सा दिखाता है कि पीयूष पांडे सिर्फ एक महान क्रिएटिव डायरेक्टर ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन इंसान भी थे, जो लोगों के विचारों का सम्मान करना जानते थे। वहीं, यह घटना नसीरुद्दीन शाह के उसूलों पर टिके रहने वाले व्यक्तित्व को भी दर्शाती है, भले ही वह प्रोजेक्ट देश का सबसे बड़ा 'एकता गीत' ही क्यों न हो।

आज जब पीयूष पांडे नहीं हैं, तो उनके द्वारा साझा किए गए ये छोटे-छोटे किस्से ही उनकी यादों को और भी खास बना देते हैं। 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' हमेशा भारत की एकता का प्रतीक रहेगा, और इस प्रतीक के पीछे की ये अनसुनी कहानियां इसे और भी यादगार बनाती हैं।