एमपी में 50 साल पुराना पेंशन नियम बदला, अब बेटों से पहले बेटियों को मिलेगी पेंशन, 1 अप्रैल से लागू होगी नई व्यवस्था!
मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए राज्य के 50 साल पुराने पेंशन नियमों में एक बड़े बदलाव को मंजूरी दे दी है. इस नए नियम के लागू होने के बाद अब माता-पिता की मृत्यु होने पर उनकी पेंशन की पहली हकदार घर की बड़ी बेटी होगी, चाहे उसका छोटा भाई क्यों न हो. सरकार का यह फैसला 1 अप्रैल से पूरे प्रदेश में लागू करने की तैयारी है, जिसका आधिकारिक प्रस्ताव तैयार हो चुका है और जल्द ही इसे कैबिनेट की अंतिम मुहर के लिए पेश किया जाएगा. इस फैसले से प्रदेश की लाखों बेटियों को आर्थिक संबल मिलेगा.
अब बेटे नहीं, बेटी होगी पहली हकदार
सरकार द्वारा प्रस्तावित नए नियमों के अनुसार, अगर किसी परिवार में बेटी अपने भाई से बड़ी है, तो माता-पिता की पेंशन पर पहला अधिकार उसी का होगा. यह कदम सामाजिक समानता की दिशा में एक मील का पत्थर माना जा रहा है. अब तक के नियमों के मुताबिक, माता-पिता के बाद पेंशन पहले बेटे को और फिर बेटी को मिलती थी. लेकिन अब इस व्यवस्था को बदलते हुए बेटी को प्राथमिकता दी गई है, जिससे परिवार में उनके सम्मान और अधिकारों को नई मजबूती मिलेगी.
आजीवन मिलेगा पेंशन का लाभ, 25 साल की आयु सीमा खत्म
नए नियमों के तहत अविवाहित, विधवा और तलाकशुदा बेटियों को अब पूरी जिंदगी पारिवारिक पेंशन का लाभ दिया जाएगा. इसके लिए 25 साल की अधिकतम आयु सीमा को हटा दिया गया है.अब तक अविवाहित बेटियों को सिर्फ 25 वर्ष की आयु तक ही पेंशन की पात्रता थी. यह फैसला उन हजारों बेटियों के लिए एक बड़ा सहारा बनेगा, जिनके पास आय का कोई स्थिर स्रोत नहीं है और वे सम्मान के साथ अपना जीवन जी सकेंगी.
दिव्यांगजनों को भी मिला बड़ा सहारा
मध्य प्रदेश सरकार ने नए पेंशन नियमों में दिव्यांगजनों के भविष्य की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा है. अब ऐसे दिव्यांग बेटे-बेटी या भाई-बहन जो अपनी शारीरिक या मानसिक अक्षमता के कारण आजीविका कमाने में असमर्थ हैं, उन्हें भी पारिवारिक पेंशन का पात्र माना जाएगा. सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि माता-पिता के न रहने की स्थिति में किसी भी दिव्यांग आश्रित को आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े और उन्हें जीवनभर सहारा मिलता रहे.
सामाजिक सोच में बड़े बदलाव की आहट
पेंशन नियमों में किया गया यह बदलाव सिर्फ एक आर्थिक फैसला नहीं है, बल्कि यह समाज में बेटियों के प्रति चली आ रही रूढ़िवादी सोच पर भी एक गहरी चोट है. इस फैसले से न केवल बेटियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनेंगी, बल्कि परिवार और समाज में उन्हें बराबरी का दर्जा भी हासिल होगा. सरकार का यह कदम महिलाओं को सशक्त बनाने और उन्हें पुरुषों के समान अधिकार दिलाने की दिशा में एक मजबूत और सराहनीय पहल है, जिससे आने वाले समय में एक नए और प्रगतिशील समाज की नींव रखी जाएगी.