नीट टॉपर भी यहाँ हुए फेल एम्स में 6 बार फेल होने के बाद खुला किस्मत का ताला, पर एक कहानी रह गई अधूरी
News India Live, Digital Desk : अक्सर हम कहते हैं कि अगर एक बार बच्चे का एडमिशन एम्स में हो गया, तो समझो उसकी लाइफ बन गई। लेकिन क्या हकीकत वाकई इतनी सीधी है? हाल ही में एम्स दिल्ली से एक ऐसी रिपोर्ट आई जिसने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया। यहाँ कुछ ऐसे छात्र थे जो एक-दो बार नहीं, बल्कि पिछले 6 सालों से एमबीबीएस (MBBS) के पहले ही साल में अटके हुए थे।
वो 7 चेहरे जिन्हें मिल गई मंज़िल
एम्स जैसे संस्थान में जहां देश के सबसे ब्रिलियंट दिमाग पढ़ते हैं, वहां प्रथम वर्ष की परीक्षा भी किसी लोहे के चने चबाने से कम नहीं है। सालों के संघर्ष और कई कोशिशों के बाद अब खबर आई है कि उन 'पुराने' छात्रों में से 7 विद्यार्थियों ने आखिरकार पहले साल की बाधा पार कर ली है। इनके लिए यह सिर्फ एक परीक्षा पास करना नहीं है, बल्कि उस टैग से छुटकारा पाना है जिसने इन्हें सालों तक एक ही कमरे और उन्हीं किताबों के बीच कैद कर रखा था।
लेकिन... एक कहानी अब भी अधूरी है
इस पूरी खबर का सबसे भावुक हिस्सा वह एक छात्रा है, जो इस बार भी सफल नहीं हो सकी। उसने भी नीट-यूजी की मेरिट लिस्ट में जगह बनाई थी, उसके पास भी डॉक्टर बनने का वही सपना था, लेकिन छठे प्रयास में भी परिणाम उसके पक्ष में नहीं रहा। एक तरफ उसके साथ के लोग आगे बढ़ गए, और वह अब भी उसी मोड़ पर खड़ी है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि सफलताओं के शोर के बीच कुछ खामोशियां बहुत गहरी होती हैं।
क्यों फेल हो जाते हैं नीट टॉपर्स?
एक सवाल हर किसी के मन में आता है कि जो बच्चा देश के लाखों छात्रों को पीछे छोड़कर एम्स पहुँचा, वह एक कॉलेज लेवल की परीक्षा में बार-बार कैसे फेल हो सकता है? जानकारों की मानें तो इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं:
- अचानक बढ़ता बोझ: कोचिंग और रट्टा मारकर नीट पास करना और एम्स के क्लिनिकल वातावरण में खुद को ढालना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं।
- मानसिक दबाव: 'नंबर-1' संस्थान में पढ़ने का जो ठप्पा लगता है, वह कभी-कभी छात्र को परफॉरमेंस एंग्जायटी (घबराहट) में डाल देता है।
- बदलता माहौल: कई बार घर से दूर और एक प्रतिस्पर्धी माहौल में छात्र तालमेल नहीं बिठा पाते।
क्या सिस्टम में सुधार की जरूरत है?
एम्स ने इन छात्रों को बार-बार मौके दिए, जो उनकी संवेदनशीलता दिखाता है। लेकिन सोचने वाली बात ये भी है कि अगर कोई छात्र साल दर साल एक ही जगह अटका है, तो क्या उसे केवल 'परीक्षा के अंकों' के आधार पर जज किया जाना चाहिए या फिर उसे किसी विशेष काउंसिलिंग की जरूरत है?
एक सीख सबके लिए
यह कहानी उन तमाम छात्रों के लिए एक सबक है जो सिर्फ 'रिजल्ट' को अपनी पूरी जिंदगी मान लेते हैं। हारना बुरा नहीं है, लेकिन हारकर रुक जाना और सिस्टम की पहेलियों में फंस जाना दर्दनाक है। उन 7 छात्रों को नई शुरुआत की बधाई, और जो एक पीछे रह गई, उसके लिए समाज और संस्थान को मिलकर एक रास्ता खोजना होगा।
डॉक्टर बनने का सपना सफेद कोट पहनने से कहीं ज्यादा है यह रातों की नींद और सालों के धैर्य की कहानी है, जिसे एम्स के इन छात्रों ने हम सबको करीब से दिखाया है।