झारखंड हाई कोर्ट की सख्ती फर्जी नक्सली सरेंडर केस में सरकार को झाड़ा, DGP से मांगा सीधा जवाब
News India Live, Digital Desk : नक्सलवाद झारखंड के लिए हमेशा से एक नासूर रहा है। लेकिन जरा सोचिए, अगर इस समस्या से लड़ने वाली पुलिस ही "नकली समस्या" खड़ी करने लगे तो आम आदमी का भरोसा कहाँ जाएगा?
झारखंड का चर्चित 'फर्जी नक्सली सरेंडर घोटाला' (Fake Naxal Surrender Case) एक ऐसा मामला है, जिसने खाकी वर्दी पर बहुत गंभीर सवाल खड़े किए हैं। और अब, इस मामले में झारखंड हाई कोर्ट (Jharkhand High Court) का सब्र भी टूट गया है।
अदालत ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को न सिर्फ जमकर फटकार लगाई है, बल्कि सूबे के पुलिस मुखिया यानी DGP (Director General of Police) को सीधे निर्देश दिया है कि वो खुद शपथ पत्र (Affidavit) दाखिल करें।
क्या है ये 'फर्जी सरेंडर' का पूरा खेल?
जिन पाठकों को नहीं पता, उन्हें बता दें कि यह घोटाला दरअसल लालच और धोखे की कहानी है।
आरोप है कि कुछ भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों और दलालों ने मिलकर एक 'सिंडिकेट' बनाया था। ये लोग भोले-भाले गांव वालों या बेरोजगार युवकों को पकड़ते थे, उन्हें डराते-धमकाते थे या नौकरी/पैसे का लालच देते थे। फिर उन्हें "खूंखार नक्सली" बताकर पुलिस के सामने सरेंडर (Surrender) करवा देते थे।
इससे होता क्या था?
सरकार नक्सलियों के सरेंडर पर जो लाखों रुपये का ईनाम (Reward Money) देती थी, वो पैसा ये अधिकारी और दलाल आपस में बांट लेते थे। और जिसका सरेंडर होता था, वो बेचारा पूरी ज़िंदगी के लिए "नक्सली" होने का कलंक माथे पर लेकर जेल चला जाता था या कानूनी पचड़ों में फंस जाता था।
कोर्ट क्यों हुआ इतना नाराज?
इस मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के जजों ने देखा कि इतनी बड़ी धांधली होने के बावजूद, सरकार और विभाग ने दोषियों पर वो कार्रवाई नहीं की जिसकी उम्मीद थी।
कोर्ट ने सरकार के वकीलों से तीखे सवाल पूछे—
"जो अधिकारी इस फर्जीवाड़े में शामिल थे, उन पर अब तक क्या एक्शन लिया गया? सिर्फ़ दिखावे की जांच चल रही है या वाकई में किसी को सजा मिलेगी?"
कोर्ट इस बात से खफा था कि इस मामले की सीबीआई (CBI) जांच और अन्य रिपोर्ट सामने आने के बाद भी विभागीय कार्रवाई (Departmental Action) कछुए की रफ़्तार से चल रही है। ऐसा लग रहा था मानो मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश हो रही हो।
अब DGP को देना होगा हिसाब
अदालत ने साफ़ कह दिया है कि उसे नीचे के अधिकारियों की रिपोर्ट पर अब भरोसा नहीं रहा। इसलिए, अब खुद झारखंड के डीजीपी को शपथ पत्र दाखिल करके यह बताना होगा कि:
- इस घोटाले में शामिल कितने पुलिसवालों पर कार्रवाई हुई?
- जिन्होंने मासूमों की जिंदगी बर्बाद की, क्या उन्हें सजा मिली?
- और भविष्य में ऐसा न हो, इसके लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
इंसाफ की उम्मीद
यह मामला सिर्फ़ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि मानवाधिकार (Human Rights) का है। सोचिए, उस युवक पर क्या बीतती होगी जो नक्सली था ही नहीं, लेकिन रिकॉर्ड में उसे 'सरेंडर नक्सली' बना दिया गया। हाई कोर्ट का यह कड़ा रुख उन पीड़ितों के लिए उम्मीद की एक किरण है जो सालों से न्याय की आस लगाए बैठे हैं।
अब देखना होगा कि अगली सुनवाई में DGP क्या जवाब लेकर आते हैं, और क्या वर्दी के पीछे छिपे 'असली गुनहगारों' के चेहरे बेनकाब होंगे?