तालिबान से ज्यादा ताकतवर सेना, फिर भी अफगानिस्तान में जमीनी हमला करने से क्यों डर रहा पाकिस्तान
पड़ोसी देशों पाकिस्तान और अफगानिस्तान (Pakistan and Afghanistan Conflict) के बीच डूरंड लाइन (Durand Line) पर तनाव लगातार खतरनाक स्तर पर पहुंचता जा रहा है। पिछले कुछ समय से दोनों देशों की सेनाओं और तालिबान लड़ाकों के बीच कई बार हिंसक झड़पें देखने को मिली हैं। अक्टूबर 2025 में पाकिस्तानी वायु सेना द्वारा अफगानिस्तान के भीतर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के ठिकानों पर की गई एयर स्ट्राइक के बाद यह संघर्ष एक नए और गंभीर चरण में प्रवेश कर चुका है।
हालांकि, यदि पारंपरिक सैन्य ताकतों की तुलना की जाए तो पाकिस्तान की सेना अफगानिस्तान के मुकाबले कई गुना ज्यादा ताकतवर है, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान ने जमीनी फौज उतारने के बजाय केवल हवाई हमलों (Air Strikes) तक ही अपनी कार्रवाई को सीमित रखा है। आखिर इसके पीछे की असली वजह क्या है? आइए जानते हैं।
दोनों देशों की सैन्य ताकतों में भारी असंतुलन
ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स के आंकड़ों पर नजर डालें तो सैन्य क्षमता के मामले में पाकिस्तान दुनिया भर में 14वें स्थान पर आता है और वह एक परमाणु संपन्न देश है। इसके विपरीत, अफगानिस्तान इस सूची में बहुत पीछे 121वें पायदान पर है। तालिबान शासन के पास अपनी कोई आधिकारिक या संगठित वायु सेना नहीं है, और उनके लड़ाके मुख्य रूप से अमेरिका तथा पूर्व अफगान सेना द्वारा छोड़े गए हथियारों और पारंपरिक गुरिल्ला युद्ध रणनीति पर ही निर्भर हैं।
आधुनिक युद्ध प्रणाली में जहां हवाई वर्चस्व (Air Superiority) को सबसे बड़ा हथियार माना जाता है, वहीं पाकिस्तानी वायु सेना अपने हवाई क्षेत्र की मजबूती के कारण आसानी से अफगान सीमा में घुसकर TTP के संदिग्ध ठिकानों को निशाना बनाकर सुरक्षित लौट आती है। बावजूद इसके, जमीनी कार्रवाई से पाकिस्तान लगातार बच रहा है।
अफगानिस्तान का दुर्गम भूगोल और इतिहास
पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान के भीतर बड़े पैमाने पर जमीनी सेना न भेजने के पीछे सबसे बड़ा कारण वहां का कठिन और खतरनाक भूगोल है। अफगानिस्तान का अधिकांश भूभाग हिंदूकुश और सफेद कोह जैसी पथरीली और बेहद कठिन पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ है।
यह भौगोलिक बनावट पारंपरिक और भारी-भरकम फौजी टुकड़ियों की आवाजाही के लिए लगभग असंभव है, जबकि गुरिल्ला और असममित युद्ध (Asymmetric Warfare) लड़ने वाले तालिबान लड़ाकों के लिए यह इलाका प्राकृतिक ढाल का काम करता है। इतिहास गवाह है कि ब्रिटेन, सोवियत संघ (रूस) और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी महाशक्तियां भी इसी भौगोलिक जटिलता के कारण अफगानिस्तान में दीर्घकालिक नियंत्रण स्थापित करने में पूरी तरह असफल रही थीं।
आर्थिक संकट और पूर्ण युद्ध का खतरा
पाकिस्तान वर्तमान में एक गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। यदि पाकिस्तान अपनी जमीनी सेना को अफगानिस्तान के अंदर उतारता है, तो यह संघर्ष एक पूर्ण और भीषण युद्ध में बदल सकता है।
ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका ने 2001 से 2021 के बीच अफगान युद्ध पर लगभग 2.26 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए थे और उसके हजारों सैनिक मारे गए थे। ऐसे में पहले से कर्ज के बोझ तले दबे पाकिस्तान के लिए एक लंबे और खर्चीले जमीनी युद्ध का वित्तीय तथा लॉजिस्टिकल बोझ उठाना असंभव है। जमीनी कार्रवाई से अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव और वैश्विक प्रतिबंधों का खतरा भी बढ़ जाएगा, जिससे बचने के लिए पाकिस्तान केवल हवाई हमलों के जरिए सीमित दबाव बनाए रखने की नीति पर काम कर रहा है।