अपनों ने ही खोला मोर्चा, भड़के वेंस ने इजरायल को दी सख्त चेतावनी
ईरान के साथ हुए नए प्रारंभिक शांति समझौते को लेकर अमेरिका में एक बहुत बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है। इस समझौते को विपक्ष और नीति आलोचकों द्वारा बेहद कमजोर और तेहरान के सामने 'आत्मसमर्पण' करार दिए जाने के बाद चारों तरफ से घिरे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को खुलकर मोर्चा संभाला। ट्रंप ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए इस बात से साफ इनकार किया है कि अमेरिका ईरान के सामने झुक गया है या उसे किसी भी तरह की भारी वित्तीय राहत सौंपने जा रहा है।
व्हाइट हाउस से बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा— "हम किसी बेबसी या लाचारी में ईरान से नहीं मिले थे, बल्कि सच यह है कि ईरान खुद हताश और पूरी तरह खत्म हो चुका था। हम इस 60 दिनों की समीक्षा अवधि को बेहद गंभीरता से देखेंगे। इस समझौते के तहत ईरान को कोई पैसा नहीं मिल रहा है, एक सिंगल सेंट भी नहीं!"
जी-7 शिखर सम्मेलन (G-7 Summit) में भाग लेने के बाद वर्साय में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा दूरस्थ रूप से हस्ताक्षरित इस प्रारंभिक समझौते का मुख्य उद्देश्य एक व्यापक और स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में अगले 60 दिनों के भीतर तेज गति से काम शुरू करना था। लेकिन शांति की इस कोशिश ने अमेरिका के भीतर ही एक अभूतपूर्व आंतरिक राजनीतिक युद्ध छेड़ दिया है।
रिपब्लिकन खेमे और कैपिटल हिल में खुली बगावत, अपनों ने बताया 'सदी की सबसे बड़ी भूल'
इस समझौते ने रिपब्लिकन पार्टी को वैचारिक रूप से दो फाड़ कर दिया है। ट्रंप के सबसे वफादार माने जाने वाले कई रिपब्लिकन सीनेटर अब अपनी ही सरकार के इस कदम के खिलाफ खुलकर खड़े हो गए हैं। रिपब्लिकन सीनेटर बिल कैसिडी उन प्रमुख नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने अपनी पार्टी के आधिकारिक रुख से पूरी तरह अलग हटकर इस डील की तीखी आलोचना की है। कैसिडी ने इसे पिछले कई दशकों की सबसे खराब अमेरिकी विदेश नीति की भूल करार दिया है।
दूसरी तरफ, यह समझौता लेट-नाइट कॉमेडियन्स और सोशल मीडिया ट्रोल्स के लिए भी एक बड़ा मुद्दा बन गया है। सोशल मीडिया पर लोग इस समझौते का उपहास उड़ाते हुए इसकी तुलना 'एक ऐसा युद्ध जीतने से कर रहे हैं जिसकी जीत की रसीद ही कहीं खो गई हो।' व्हाइट हाउस के लिए सबसे गंभीर और चिंताजनक बात यह है कि इस बार आलोचना की यह धार सिर्फ विरोधी डेमोक्रेट्स तक सीमित नहीं है, बल्कि कैपिटल हिल के वे रिपब्लिकन सांसद भी बगावत पर उतर आए हैं जो आमतौर पर ट्रंप के हर फैसले को पत्थर की लकीर मानते थे।
इजरायल-समर्थक गुट हैरान: यूरेनियम संवर्धन पर ट्रंप के बदले सुर
राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद भी कुछ ऐसे चौंकाने वाले बयान दिए हैं जिससे अमेरिका के भीतर सक्रिय इजरायल-समर्थक (Pro-Israel) लॉबी और गुट पूरी तरह हैरान हैं। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ईरान के कुछ बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता रखने के अधिकार का समर्थन कर दिया और तेहरान के संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) के भंडार के खतरे को काफी कम करके आंका।
अमेरिकी राष्ट्रपति अब अप्रत्यक्ष रूप से ईरान के नागरिक परमाणु कार्यक्रम के अधिकार को भी स्वीकार करते दिख रहे हैं, जो उनके उस पुराने चुनावी वादे से बिल्कुल उलट है जिसमें उन्होंने कसम खाई थी कि अमेरिका, ईरान को यूरेनियम के किसी भी स्तर के संवर्धन की अनुमति कभी नहीं देगा। हालांकि, ट्रंप अब भी इस बात पर मजबूती से अड़े हैं कि ईरान को कभी भी अंतिम रूप से परमाणु हथियार (Nuclear Weapon) बनाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।
ओबामा की जेसीपीओए बनाम ट्रंप की डील: नीति विशेषज्ञों ने दावों की खोली पोल
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि ईरान के साथ हुआ यह नया समझौता एक कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक है और यह पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के साल 2015 के ऐतिहासिक जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) से कहीं ज्यादा बेहतर और मजबूत है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मामलों के नीति विशेषज्ञ इस सरकारी दावे को खुली चुनौती दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि जहां ओबामा का परमाणु समझौता कई सौ पन्नों का एक बेहद विस्तृत, जटिल और तकनीकी दस्तावेज था, वहीं ट्रंप का यह नया समझौता महज डेढ़ पन्ने का एक अधूरा मसौदा (Draft) है, जो केवल एक साधारण हाथ मिलाने के बदले तेहरान को सब कुछ सौंप देता है। इसी अधूरेपन के कारण ट्रंप के कोर समर्थक भी इस समझौते को पचा नहीं पा रहे हैं।
पाकिस्तान रेस से बाहर, कतर बना अमेरिका-ईरान का नया पसंदीदा बिचौलिया
इस महा-समझौते के बीच वेंस की स्विट्जरलैंड यात्रा स्थगित होने से मध्यस्थता करने वाले देशों का क्षेत्रीय भू-राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गया है। पड़ोसी देश पाकिस्तान, जिसने खुद को इस पूरे विवाद में मुख्य राजनयिक मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया था और अप्रैल महीने में दोनों देशों के बीच आमने-सामने की वार्ताओं की बड़े गर्व से मेजबानी की थी, वह अचानक इस पूरी रेस से बाहर हो गया है।
इस्लामाबाद के शीर्ष अधिकारी इस बड़ी उम्मीद में बैठे थे कि वे अमेरिका और ईरान के बीच इस ऐतिहासिक कूटनीतिक डील को अमली जामा पहनाकर एक बड़ी वैश्विक भू-राजनीतिक जीत हासिल करेंगे। लेकिन कतर (Qatar) के अचानक एक बेहद अमीर, प्रभावशाली और पसंदीदा मध्यस्थ के रूप में उभरने से पाकिस्तान की स्थिति अंतरराष्ट्रीय पटल पर बेहद असहज और अपमानजनक हो गई है। पाकिस्तान की हालत अब उस बिन बुलाए शादी के मेहमान जैसी हो गई है जिसे ऐन वक्त पर पता चला कि शादी का वेन्यू ही बदल चुका है।
मागा (MAGA) गठबंधन में दरार: वेंस की यरुशलम को दोटूक, नेतन्याहू का पीछे हटने से इनकार
इस कूटनीतिक उथल-पुथल का सबसे बड़ा और वास्तविक नुकसान ट्रंप के अपने 'मागा' (MAGA) गठबंधन की आंतरिक शांति को हुआ है। एक तीखे और बेहद आक्रामक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने पारंपरिक कूटनीतिक शालीनता को ताक पर रखते हुए सीधे यरुशलम पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने इजरायली अधिकारियों को दोटूक शब्दों में कहा कि वे गहरी नींद से जागें और जमीनी हकीकत को समझें।
वेंस ने इजरायली कैबिनेट को कड़े लहजे में याद दिलाया कि उनके दो-तिहाई रक्षा हथियारों का भारी-भरकम खर्च अमेरिकी टैक्सपेयर्स के पैसों से उठाया जाता है। वेंस ने गुस्से में कहा— "अगर मैं आज इजरायल सरकार की कैबिनेट में बैठा होता, तो मैं पूरी दुनिया में बचे अपने इकलौते और सबसे शक्तिशाली सहयोगी (अमेरिका) पर इस तरह के बेतुके हमले नहीं कर रहा होता।"
यह सार्वजनिक टकराव मागा व्हाइट हाउस और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच संबंधों में आई अचानक और बड़ी गिरावट को साफ उजागर करता है। अपनी ही घरेलू राजनीति में कड़े चुनावों का सामना कर रहे इजरायली पीएम नेतन्याहू ने दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना को हटाने से साफ तौर पर इनकार कर दिया है, जो सीधे तौर पर राष्ट्रपति ट्रंप के युद्धविराम (Ceasefire) के प्रस्ताव को खारिज करने जैसा है। इस अभूर्व दरार ने अमेरिका-इजरायल के ऐतिहासिक संबंधों को एक बेहद संवेदनशील और खतरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।