MBS बनाम MBZ की वर्चस्व की जंग में यमन से यूएई की बेदखली पड़ी भारी, क्या कंगाल हो जाएगा सऊदी अरब
मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक गलियारों में इस समय एक ऐसी खलबली मची हुई है जिसने खाड़ी देशों के दो सबसे ताकतवर मुल्कों—सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE)—के आपसी संबंधों की कलई खोलकर रख दी है। सऊदी अरब के वली अहद यानी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) और यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (MBZ) के बीच कूटनीतिक और क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर चल रही खींचतान अब रियाद के लिए जी का जंजाल बनती जा रही है। जानकारों का मानना है कि प्रिंस सलमान ने यूएई को नीचा दिखाने और यमन के रणनीतिक मामलों से बाहर करने के चक्कर में एक ऐसी बड़ी सामरिक चूक कर दी है, जिसके परिणामस्वरूप ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को लाल सागर और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य के पास अपार बढ़त मिल गई है। यमन के रणक्षेत्र में खेली गई इस सियासी और कूटनीतिक चाल का खामियाजा अब सीधे तौर पर सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और तेल संपदा को भुगतना पड़ रहा है, जिससे यह सवाल जोर पकड़ने लगा है कि क्या हूतियों का यह बढ़ता आतंक सऊदी साम्राज्य को आर्थिक रूप से तबाह कर देगा?
MBS और MBZ की व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता ने कैसे तबाह किया यमन का समीकरण?
इस पूरे संकट की पटकथा तब लिखी गई जब खाड़ी क्षेत्र में अपना आर्थिक और रणनीतिक दबदबा कायम करने की होड़ में सऊदी क्राउन प्रिंस MBS ने यूएई के खिलाफ आक्रामक नीतियां अपनानी शुरू कर दीं। वैश्विक व्यापार और विमानन के क्षेत्र में दुबई के बढ़ते रसूख को चुनौती देने के लिए सऊदी अरब ने विजन 2030 के तहत खरबों डॉलर झोंकना शुरू किया, जिसका असर दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों पर भी साफ दिखा। इसी व्यक्तिगत और रणनीतिक महत्वाकांक्षा के तहत MBS ने यमन के भीतर यूएई समर्थित सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (STC) और स्थानीय ताकतों को कमजोर करना शुरू कर दिया, जो वास्तव में दक्षिणी यमन में हूती विद्रोहियों को रोकने वाली एकमात्र मजबूत दीवार माने जाते थे। सऊदी वायु सेना द्वारा अपने ही सहयोगियों पर एयरस्ट्राइक करने और स्थानीय नेतृत्व को दरकिनार करने के इस फैसले ने यमन के रक्षा तंत्र को अंदर से खोखला कर दिया। जब यूएई समर्थित बल और अन्य स्थानीय ताकतें आपस में ही उलझ गईं, तो इसका सीधा फायदा उठाते हुए ईरान समर्थित हूतियों ने ताबड़तोड़ हमले कर सामरिक रूप से बेहद अहम मोचा बंदरगाह और लाल सागर के तटीय इलाकों पर कब्जा जमा लिया।
बाब अल-मंडेब पर हूतियों का कब्जा और लाल सागर का बढ़ता सुरक्षा संकट
यमन के रास्ते लाल सागर और बाब अल-मंडेब के अहम चोकपॉइंट पर हूती विद्रोहियों का नियंत्रण स्थापित होना पूरी दुनिया के साथ-साथ विशेष रूप से सऊदी अरब के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है। यह वही समुद्री मार्ग है जहाँ से दुनिया का एक बहुत बड़ा तेल और व्यापारिक जहाजों का बेड़ा गुजरता है। पहले जहाँ यूएई के सहयोग से बनी स्थानीय फौजें इन विद्रोहियों को उनकी सीमाओं में बांधकर रखती थीं, वहीं अब सऊदी नीतियों के चलते वे ताकतें या तो बिखर चुकी हैं या मैदान छोड़कर पीछे हट चुकी हैं। नतीजतन, हूतियों ने आधुनिक ड्रोनों और मिसाइलों के जरिए सीधे सऊदी अरब की मुख्य भूमि और उसकी तेल परिसंपत्तियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। हाल ही में हूती हमलों के बाद सऊदी अरब को अपनी 1200 किलोमीटर लंबी पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन को भी एहतियातन बंद करना पड़ा है। सामरिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो सऊदी अरब के तेल निर्यात और उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ को गहरा आघात पहुँच सकता है, जिससे देश भारी वित्तीय संकट में घिर सकता है।
ट्रंप प्रशासन से मदद की गुहार और वाशिंगटन से मिला झटका
अपनी ही रणनीतिक भूलों के कारण जब चारों तरफ से घिर गए, तो क्राउन प्रिंस MBS ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से संपर्क साधकर हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य हस्तक्षेप और हवाई हमले करने की पुरजोर अपील की। सऊदी नेतृत्व को पूरी उम्मीद थी कि अमेरिका हमेशा की तरह उसके समर्थन में सीधी सैन्य कार्रवाई करेगा, लेकिन वाशिंगटन की तरफ से रियाद को तगड़ा झटका मिला है। अमेरिकी प्रशासन ने सीधे तौर पर युद्ध के मैदान में उतरने या हूतियों के खिलाफ व्यापक सैन्य अभियान छेड़ने से साफ इनकार कर दिया है। हालांकि, अमेरिका ने सऊदी अरब को केवल खुफिया जानकारी (Intelligence Sharing) और सीमित टारगेटिंग डेटा देने पर सहमति जताई है, ताकि सऊदी सेना खुद अपना बचाव कर सके। पाकिस्तान और अन्य क्षेत्रीय सहयोगियों से भी अपेक्षित मदद न मिलने के कारण अब सऊदी अरब खुद को कूटनीतिक मोर्चे पर काफी हद तक अकेला महसूस कर रहा है, जिससे रियाद के नीति-निर्माताओं की नींद उड़ गई है।
क्या सऊदी अरब को कंगाल कर देंगे हूती विद्रोही? भविष्य की डरावनी तस्वीर
आज के समय में यमन का रणक्षेत्र सऊदी अरब के लिए एक ऐसा दलदल बन चुका है जहाँ से निकलना प्रिंस सलमान के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। एक तरफ जहां देश के भीतर विजन 2030 के तहत मेगा प्रोजेक्ट्स पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय युद्ध और हूती मिसाइल हमलों से निपटने में अरबों डॉलर खर्च हो रहे हैं। यदि लाल सागर में हूतियों का दबदबा इसी तरह बढ़ता रहा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल आपूर्ति बाधित हुई, तो सऊदी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। जानकारों का मानना है कि यदि MBS ने अपनी जिद और यूएई के साथ चल रही अहंकार की लड़ाई को छोड़कर क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सामूहिक कूटनीति का रास्ता नहीं अपनाया, तो यह संघर्ष सऊदी अरब को दीर्घावधि में भारी आर्थिक तबाही की ओर धकेल सकता है। आने वाला वक्त यह तय करेगा कि रियाद अपने इस कूटनीतिक संकट से कैसे बाहर निकलता है और क्या खाड़ी के दो दिग्गज देश अपने मतभेदों को भुलाकर इस साझा खतरे से निपट पाते हैं या नहीं।